अपने पिता के निधन के बाद महबूबा मुफ्ती ने मुख्यमंत्री पद पर काबिज होने की जल्दबाजी न दिखाते हुए तीन ऐसे कामों पर ध्यान लगाया है जिससे उनकी और पीडीपी की स्थिति मजबूत हो सके.

बीते रविवार को जम्मू ऐंड कश्मीर पीपुल्स डेमोक्रेटिक पार्टी यानी पीडीपी की पांच घंटे तक चली बैठक में पार्टी की ओर से सरकार बनाने से संबंधित हर फैसले के लिए पार्टी प्रमुख महबूबा मुफ्ती को नामित कर दिया गया. इस बैठक के बाद जो बातें पीडीपी के हवाले से आईं, उनसे इस बात की संभावना अधिक दिख रही है कि जम्मू कश्मीर में पीडीपी और भारतीय जनता पार्टी की सरकार बरकरार रहने वाली है.

राज्य के मुख्यमंत्री मुफ्ती मोहम्मद सईद के निधन के बाद हर किसी को यह लग रहा था कि महबूबा ही अब सूबे की मुख्यमंत्री बनेंगी. लेकिन भाजपा के प्रदेश स्तर के कुछ नेताओं की बयानबाजी ने महबूबा को इस बीच वह सब करने का अवसर दे दिया जिसकी उनकी पार्टी को तलाश थी. महबूबा ने मुख्यमंत्री पद की शपथ लेने में कोई जल्दबाजी नहीं दिखाई. बल्कि उन्होंने अपने पिता के निधन के बाद के वक्त का इस्तेमाल वह असंतुलन दूर करने में किया जो भाजपा के साथ उनकी पार्टी की गठबंधन सरकार बनने से उनके सामने पैदा हुआ था.

मुख्यमंत्री के तौर पर शपथ लेने में कोई जल्दबाजी न दिखाकर सबसे पहले तो महबूबा मुफ्ती ने सूबे में अपनी एक ऐसे नेता की छवि गढ़ने की कोशिश की जो सिर्फ सत्ताकांक्षी नहीं है.

जम्मू कश्मीर में पीडीपी भाजपा की सांप्रदायिकता को रोकने के नाम पर ही चुनाव लड़ी थी. ऐसे में भाजपा के साथ मिलकर सरकार बनाने के बाद से पार्टी पर न सिर्फ कई तरह के आरोप लगे बल्कि पार्टी के कई बड़े नेताओं को ऐसा लगा कि सूबे में उनका आधार सिमट रहा है. जब मुफ्ती मोहम्मद सईद की अंतिम यात्रा में सिर्फ 5,000 लोग जमा हुए तो इसे भी पार्टी के खिसकते आधार से जोड़कर देखा गया. ऐसे में राजनीतिक सूझबूझ का परिचय देते हुए महबूबा मुफ्ती ने मुख्यमंत्री पद पर काबिज होने में कोई जल्दबाजी नहीं दिखाई और कम से कम तीन ऐसे काम किए, जिनसे खुद वे और उनकी पार्टी सियासी तौर पर मजबूत हुई है.

सत्ताकांक्षी नेता से बड़ी छवि 

मुख्यमंत्री के तौर पर शपथ लेने में कोई जल्दबाजी न दिखाकर सबसे पहले तो महबूबा मुफ्ती ने सूबे में अपनी एक ऐसे नेता की छवि गढ़ने की कोशिश की जो सिर्फ सत्ताकांक्षी नहीं है.mehbooba-mufti1-800x400

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