राहुल गांधी आज बुंदेलखंड के दौरे पर हैं. उनके पिछले दौरे की पूछ-परख हमें यह बता सकती है आम ग्रामीणों को ऐसे सियासी दौरों का कितना फायदा मिलता है

विशेष रिपोर्टनौ अक्टूबर 2010 की बात है. उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव होने में अभी साल भर का समय बाकी था. कांग्रेस के तत्कालीन महासचिव राहुल गांधी अपने लाव-लश्कर के साथ बुंदेलखंड के दौरे पर थे. 2008 में दलितों के घर खाना खाने की कवायद काफी फायदेमंद साबित हुई थी. विदर्भ की कलावती राष्ट्रीय स्तर की सेलिब्रिटी बन चुकी थीं. राहुल प्रचार की इसी तकनीक के जरिए अपने और कांग्रेस के लिए इस सूबे में नई जमीन की तलाश में थे.

अगले साल उत्तर प्रदेश में फिर विधानसभा चुनाव हैं. आज राहुल गांधी एक बार फिर बुंदेलखंड के दौरे पर हैं. पक्केतौर पर नहीं कहा जा सकता कि इस तरह के सियासी दौरे पार्टियों और नेताओं के लिए सच में फायदेमंद साबित होते हैं, लेकिन सुदूर क्षेत्रों के लोगों में ये भरोसा जरूर जगाते हैं कि उस क्षेत्र और संबंधित व्यक्ति का जीवन जरूर इससे बदला होगा. अपने पिछले दौरे पर राहुल झांसी के जिस गांव में ठहरे थे, उसके सूरतेहाल को इस किस्म के सियासी दौरों के लिए लिटमस टेस्ट की तरह इस्तेमाल किया जा सकता है.

जिस समय राहुल गांधी वहां पहुंचे थे भगवती तब तक चूल्हा-चौका कर चुकी थीं. उनकी जेठानी मालती और उन्होंने मिलकर राहुल गांधी के लिए पूरी और आलू की सब्जी बनाई थी

2010 में राहुल गांधी झांसी के मऊरानीपुर ब्लॉक के गांव मेंडकी पहुंचे थे. वहां क्या-क्या हुआ यह खबर मीडिया पर छाई हुई थी. एक प्रमुख टीवी चैनल की वेबसाइट पर यह घटना कुछ यूं दर्ज है – ‘उत्तर प्रदेश के बुंदेलखंड इलाके में झांसी जिले में मऊरानीपुर तहसील के मेंडकी गांव में रात के साढ़े आठ बजे थे. तभी एक दलित कुंजीलाल आर्य के घर की कुंडी बजने लगी. अनमने से कुंजीलाल ने जब दरवाजा खोला और दरवाजे पर खड़े कांग्रेस महासचिव राहुल गांधी को देखकर वह अवाक रह गया… वह समझ ही नहीं पा रहा था कि राहुल गांधी को कहां बैठाए. घर के बाहर ही चारपाई डाल दी जाती है और राहुल उसी पर बैठ जाते हैं. देखते-देखते बात पूरे गांव में फैल जाती है कि राहुल गांधी कुंजीलाल के घर आए हैं… गांव वाले कुछ कहें या पूछें इसके पहले ही गांधी बोल पड़ते हैं, भूख लगी है पहले खाना खाऊंगा.harsh-and-group-photo-rahul-gandhi-800x400

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