नई दिल्ली : केंद्र ने अरुणाचल प्रदेश में एक महीने से भी ज्यादा समय से चल रही राजनीतिक उठापटक के बीच मंगलवार को राष्ट्रपति शासन लागू कर दिया और विधानसभा को निलंबित रखा। इस मामले के सुप्रीम कोर्ट में होने के बीच कांग्रेस और अन्य दलों ने इस कदम की तीखी आलोचना की और इसे लोकतंत्र की हत्या करार दिया।

विचार-विमर्श के बाद राष्ट्रपति ने लिया फैसला

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राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी ने पिछले दो दिनों में गहन विचार विमर्श के बाद मंगलवार को केंद्रीय कैबिनेट की सिफारिश को मंजूरी प्रदान कर दी और इस आधार को स्वीकार कर लिया कि राज्य में संवैधानिक संकट है। गृह मंत्रालय ने एक बयान में कहा कि अरुणाचल प्रदेश के राज्यपाल की रिपोर्ट के अनुसार राज्य में पैदा हुए संवैधानिक संकट पर संज्ञान लेते हुए केंद्रीय कैबिनेट ने 24 जनवरी 2016 को अपनी बैठक में राष्ट्रपति से ऐसी उद्घोषणा जारी करने का अनुरोध किया था।

मंगलवार से प्रभावी हुई उद्घोषणा

इसमें कहा गया है कि राष्ट्रपति ने संविधान के अनुच्छेद 356 (1) के तहत अरुणाचल प्रदेश में राष्ट्रपति शासन लगाए जाने संबंधी उद्घोषणा पर हस्ताक्षर कर दिए हैं। यह उद्घोषणा मंगलवार से प्रभावी होगी और प्रदेश की विधानसभा निलंबित रहेगी। राष्ट्रपति ने कैबिनेट की सिफारिश के दो दिनों बाद इस उद्घोषणा पर हस्ताक्षर किए। कैबिनेट ने रविवार को हुई विशेष बैठक में राज्य में केंद्रीय शासन लागू किए जाने की सिफारिश की थी। केंद्रीय गृह राज्य मंत्री किरण रिजिजू ने कहा था कि कैबिनेट यह फैसला लेने को बाध्य थी क्योंकि वहां संवैधानिक संकट पैदा हो गया था और राज्य विधानसभा के दो सत्रों के बीच छह महीने की अवधि पूरी हो गई थी। प्रदेश में राष्ट्रपति शासन लगाए जाने की तीखी आलोचना करते हुए कांग्रेस, जेडीयू, सीपीआई और आप ने इसे संघवाद और लोकतंत्र की हत्या करार दिया और बीजेपी नीत केंद्र सरकार पर देश की सुप्रीम कोर्ट को अपमानित करने का आरोप लगाया जो अभी मामले की सुनवाई कर रही है।

बीजेपी ने किया फैसले का बचाव

हालांकि बीजेपी ने इस फैसले का बचाव करते हुए कहा कि इसे कई नजरिए से देखने की जरूरत है और यह संवैधानिक दायित्वों के अनुरूप है। इसके साथ ही पार्टी ने कांग्रेस पर मुद्दे का राजनीतिकरण करने का आरोप लगाया। कांग्रेस प्रवक्ता टॉम वडक्कन ने कहा, ‘यह लोकतंत्र की हत्या है। मामला कोर्ट में है और सरकार ने जल्दबाजी में कार्रवाई की है। यह साफ तौर पर देश के सुप्रीम कोर्ट का अपमान है। लोकतंत्र की हत्या की गयी है।’ दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविन्द केजरीवाल ने राष्ट्रपति शासन लगाए जाने की तुलना आपातकाल जैसी स्थिति से की। उन्होंने ट्वीट किया, ‘अरुणाचल में राष्ट्रपति शासन, आडवाणी जी सही कह रहे थे कि देश में आपातकाल जैसी स्थितियां हैं।’ मुखर्जी ने सोमवार को गृह मंत्री राजनाथ सिंह को बुलाया था और राष्ट्रपति शासन लगाए जाने की आवश्यकता के बारे में उनसे कुछ सवाल किए थे। वहीं राज्य में सत्तारूढ़ कांग्रेस पार्टी ने भी उनसे मुलाकात की थी और कैबिनेट के फैसले का विरोध किया था।

मामला सुप्रीम कोर्ट में है- कांग्रेस

कांग्रेस पार्टी ने राष्ट्रपति से कैबिनेट के फैसले को मंजूरी नहीं देने का अनुरोध किया था। पार्टी ने कहा था कि यह मामला सुप्रीम कोर्ट में है और कोर्ट ने कांग्रेस की याचिका पर सुनवाई करने का फैसला किया है। अरुणाचल प्रदेश में पिछले साल 16 दिसंबर से राजनीतिक संकट है जब कांग्रेस के 21 विद्रोही विधायकों ने एक अस्थाई स्थल पर विधानसभा की बैठक में बीजेपी के 11 और दो निर्दलीय विधायकों के साथ मिल कर विधानसभाध्यक्ष नबाम रेबिया के खिलाफ महाभियोग प्रस्ताव पारित कर दिया था। विधानसभाध्यक्ष ने इस कदम को अवैध और असंवैधानिक करार दिया था। इसे राज्य की शीर्ष कोर्ट ने भी बैठक को अमान्य करार दे दिया था। इस बीच सुप्रीम कोर्ट ने कैबिनेट के फैसले को चुनौती देने वाली कांग्रेस की याचिका पर 27 जनवरी को सुनवाई करने का फैसला किया है। चीफ जस्टिस टीएस ठाकुर के समक्ष, उनके निवास पर जाकर याचिका पेश की गई थी जिसमें तत्काल सुनवाई का अनुरोध किया गया है। न्यायमूर्ति ठाकुर ने इस मामले को बुधवार को सुनवाई के लिए सूचीबद्ध करने का निर्देश दिया। केंद्रीय कैबिनेट का फैसला राज्यपाल ज्योति प्रसाद राजखोवा की रिपोर्ट पर आधारित था।

सील कर दिया गया था विधानसभा परिसर

इसके पहले राज्य विधानसभा परिसर को स्थानीय प्रशासन ने सील कर दिया था। बैठक में वे 14 विधायक भी शामिल हुए जिन्हें एक दिन पहले ही अयोग्य घोषित किया गया था। 60 सदस्यीय विधानसभा के 27 विधायकों ने कार्यवाही का बहिष्कार किया। इनमें मुख्यमंत्री और उनके मंत्री भी शामिल थे। उसके एक दिन बाद एक अनोखे घटनाक्रम में, विपक्षी दल बीजेपी और कांग्रेस के विद्रोही विधायक मुख्यमंत्री नबाम तुकी को सत्ता से हटाने और उनके स्थान पर एक विद्रोही कांग्रेस विधायक का चुनाव करने के लिए एक होटल में एकत्र हुए। बीजेपी और निर्दलीय विधायकों द्वारा पेश अविश्वास प्रस्ताव को स्वीकार कर लिया गया था बाद में 33 विधायकों ने असंतुष्ट कांग्रेस विधायक कालिखो पुल को नया मुख्यमंत्री चुन लिया था। लेकिन गौहाटी हाई कोर्ट ने हस्तक्षेप करते हुए विद्रोही सत्र में लिए गए फैसले को स्थगित कर दिया था।

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