बिहार के डिप्टी सीएम तेजस्वी यादव का कहना है कि केंद्र सरकार ने 20 स्मार्ट शहरों में बिहार के किसी शहर को शामिल नहीं करके राज्य के साथ सौतेला व्यवहार किया है. सवाल यह भी उठ रहे हैं कि केंद्र ने जिन 20 शहरों को चुना है उनमें 9 शहर बीजेपी शासित राज्यों से हैं. लेकिन क्या वाकई बिहार की उपेक्षा की गई, क्योंकि सरकार ने जिस परीक्षा को आधार बनाकर यह चुनाव किया असल में उनके आधारों पर बिहार कहीं खरा ही नहीं उतरता है.

सच तो ये है कि शहरी विकास मंत्रालय की ओर स्मार्ट शहरों के चुनाव के लिए बकायदा एक परीक्षा आयोजित की गई थी. इसके लिए सबसे पहले राज्यों को अपने शहरों का नाम बताते हुए यह स्पष्ट करना था कि उन्हें क्यों चुना जाए? इसके अलावा विशेष समिति ने शहर की जनसंख्या, वहां मौजूद सुविधाओं, जीवनशैली और दूसरे कारकों के आधार पर इस सूची को तैयार किया है. लेकिन क्या बिहार सरकार राष्ट्रीय राजधानी पटना को भी जनसंख्या के लिहाज से सुविधासंपन्न बता सकती है? शायद नहीं, क्योंकि राज्य के दूसरे शहरों को छोड़ दें तो खुद पटना में स्थानीय निवासियों के लिए सरकार बिजली, पानी से लेकर शहर में जल निकासी तक की समुचित व्यवस्था नहीं कर पाई है. प्रशासनिक व्यवस्था तो दूर की बात है.

मंत्रालय का एक पैमाना यह भी था…कार्यान्वयन की विश्वसनीयता. इसके तहत शहर में बीते तीन साल में निर्माण योजना, मंजूरी, संपत्ति‍ कर का निर्धारण और संग्रह के साथ ही बिजली, पानी, यातायात, इंटरनेट की सुविधा जैसे आधारभूत जरूरतों का मूल्यांकन किया गया. बिहार की बात करें तो निर्माण की योजना और इस ओर मंजूरी की शुरुआती प्रक्रिया में ही यहां लेटलतीफी कोई नई बात नहीं है. इसके अलावा राज्य में अभी भी राजधानी पटना से लेकर मुजफ्फरपुर जैसे बड़े शहरों में इंटरनेट तो दूर सुगम यातायात की व्यवस्था ही चयन प्रक्रिया में नीतिगत भेद खोल देती है.

मंत्रालय की समिति ने तकरीबन 1.52 करोड़ लोगों से शहरों के चुनाव को लेकर भी उनसे राय ली. निवासियों की आकांक्षाओं के साथ ही सार्वजनिक सेवा वितरण, मुख्य आर्थिक गतिविधि और समग्रता पर प्रभाव को भी आंका गया. दो महीने पहले सत्तासीन हुए उपमुख्यमंत्री जी को समझना होगा कि अर्थव्यवस्था और इस ओर सरकारी प्रयास की सच्चाई किसी से छिपी हुई नहीं है. बीते 10 वर्षों में न तो राज्य से पलायन कम हुआ है और न ही सरकार रोजगार सृजन के साथ ही नए कारखानों और व्यापार के लिए सुगम रास्ता ही बना पाई है. अभी भी राज्य सरकार निवेशकों की ओर हाथ खोले खड़ी है, लेकिन प्रशासनिक कमी इस ओर निवेश के लिए सही परीपाटी नहीं बना पा रही है.

चयन प्रक्रिया में एक महत्वपूर्ण आधार कम संसाधन में स्मार्ट समाधान, सार्वजनिक सेवा वितरण और निर्माण के साथ ही रखरखाव भी बड़ा मुद्दा था. सच तो यह है कि यहां भी बिहार के हिस्से बताने के लिए कुछ नहीं है. नीतीश की सरकार संसाधन की कमी का रोना पहले से रोती आ रही है तो हर छोटे-बड़े शहर से आए दिन निर्माण और रखरखाव को लेकर दबंगई से लेकर जर्जरता की खबर आती रहती है. तेजस्वी को समझना होगा कि राजनीति का मतलब क्रिया के बदले सिर्फ प्रतिक्रिया नहीं है.

समझना यह भी होगा स्मार्ट शहरों की सूची में आने से लेकर खुद को निर्भर बनाना होगा. उस लायक बनना होगा कि केंद्र से मिलने वाले पैसे का समुचित लाभ उठाया जा सके. राज्य के छोटे नहीं तो कम से कम प्रमुख शहरों में आधारभूत सुविधाओं की व्यवस्था करनी होगी. अपराध और ठेकेदारी में दबंगई पर भी लगाम कसने की जरूरत है.

और अगर बात राजनीति की ही है तो संभवत: केंद्र सरकार के पास अच्छा मौ‍का था कि वह बंगाल, यूपी के शहरों को इसमें शामिल कर लेती, क्योंकि आने वाले दिनों में उत्तर प्रदेश, बंगाल में विधानसभा चुनाव होने हैं. खुद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी यूपी के वाराणसी से चुनकर आते हैं. चयन की परीक्षा पर सवाल उठाने से पहले तेजस्वी शायद यह भूल गए कि मोदी सरकार जिस शि‍वराज सिंह के शासन को मॉडल बताती है, खुद उनके राज्य के भोपाल को टॉप-20 में जगह बनने में पसीना आ गया और वह अंतिम नंबर पर रही.

तेजस्वी यादव को चाहिए कि वह राज्य में सरकार की क्रिया पर ध्यान दें न कि राजनीतिक प्रतिक्रिया में उलझकर ख्याति प्राप्त करें. एक गुजारिश है…. कि कम से कम अपने राज्‍य की बेहतर पैकेजिंग और उसके शानदार प्रेजेंटेशन पर भी ध्‍यान दें, ताकि अगली लिस्‍ट में हमरा बिहार आ ही जाए.

tejaswi_650_012916051500

LEAVE A REPLY