दिल्ली सरकार में कामकाज के तौर तरीके से परेशानी की तस्दीक दिल्ली के सबसे बड़े अधिकारी यानि मुख्य सचिव के के शर्मा ने सोमवार को कर दी. के के शर्मा का सारा कामकाज देखने वाले ओएसडी का तबादला शुक्रवार को सेवा विभाग ने कर दिया. वह भी बिना मुख्य सचिव को जानकारी दिए. मुख्य सचिव के ऑफिसर ऑन स्पेशल ड्यूटी रामबीर सिंह का तबादला डीडीसीए में गड़बड़ी की जांच के लिए बनाई गई सुब्रमण्यम आयोग में किया गया है.

मुख्य सचिव को बताए बिना ओएसडी का तबादला
रामबीर सिंह को ताकीद की गई कि उन्हें तत्काल प्रभाव से कार्यमुक्त किया जाता है ताकि वो 1 फरवरी की सुबह सुब्रमण्यम आयोग में रिपोर्ट कर सकें. सेवा विभाग का 29 जनवरी का आदेश उपसचिव के दस्तखत से जारी किया गया. उप सचिव विभाग के सबसे जूनियर अधिकारी हैं. विभाग के मंत्री खुद उपमुख्यमंत्री मनीष सिसोदिया हैं तो विभाग के प्रधान सचिव मुख्यमंत्री के करीबी राजेंद्र कुमार हैं. कहानी यहीं खत्म नहीं हुई.

अपने ही सरकार पर भड़के मुख्य सचिव
मुख्य सचिव के के शर्मा को यह बात रास नहीं आई. उन्होंने सोमवार को दफ्तर खुलते ही सख्त शब्दों में एक नया आदेश जारी किया. आदेश में अपने ओएसडी के ट्रांसफर को लेकर मुख्य सचिव ने न सिर्फ कड़ा ऐतराज जताया, बल्कि सेवा विभाग के शुक्रवार के फैसले को अपने दस्तखत वाले आदेश से रद्द भी कर दिया. अपने आदेश में शर्मा ने लिखा है कि सेवा विभाग ने जो तबादले का आदेश जारी किया वह मुख्य सचिव कार्यालय के एक अहम कर्मचारी के तबादले का है जिसके बारे में मुख्यसचिव से कोई भी मंजूरी नहीं ली गई. शर्मा ने फिर तीखे शब्दों का इस्तेमाल करते हुए यहां तक कहा है कि उनके दफ्तर में कई संवेदनशील और गोपनीय दस्तावेज होते हैं, जिन्हें सिर्फ मुख्य सचिव का विश्वस्त अधिकारी ही देख सकता है. साथ ही उन्होंने कहा कि चूंकि मुख्य सचिव कार्यपालिका का मुखिया भी है तो उसे कई अलग-अलग किस्म के काम भी करने होते हैं. इसलिए उनके विश्वस्त ओएसडी का ट्रांसफर गैरजरूरी है. लिहाजा वह इस आदेश को रद्द करते हैं.

प्रशासन पर उठे अहम सवाल
यानि दो दिनों के बाद खुद मुख्य सचिव ने सेवा विभाग का आदेश पलट दिया. अब सवाल खड़ा हो गया कि आखिरकार दिल्ली सरकार में फैसले कौन ले रहा है. जब दिल्ली के मुख्य सचिव तक का दफ्तर भेदभाव से अछूता नहीं है, तो फिर बाकी दफ्तरों की हालत समझी जा सकती है.

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