दरभंगा जिले के पानी में आर्सेनिक की अधिक मात्रा कैंसर का कारण बन रहा है। आर्सेनिक लोगों की रगों में घुलकर कैंसर को जन्म दे रहा है। इनमें से दो गांव तो पांच किलोमीटर के दायरे में है जबकि एक गांव करीब 30 किलोमीटर दूर। एक दशक में महिनाम, पररी तथा पघारी गांवों के सौ से ज्यादा लोगों को कैंसर निगल चुका है। हर घर के बड़े-बुजुर्गों के मन में एक अनजाना डर समा गया है कि अब कैंसर की चपेट में उनकी आद-औलाद न आ जाएं।

बेनीपुर के महिनाम गाँव के अमोद मिश्र मिलते ही अपना मुंडम सिर दिखाकर कहते हैं कि आज ही पोते चुनमुन की पहली बरसी मनाई है। वह हाईस्कूल की परीक्षा में बिहार का टॉपर रहा। दिल्ली में सिविल सर्विस की तैयारी कर रहा था तभी पता चला कि उसे ब्लड कैंसर हो गया है। गत वर्ष उसकी मौत हो गई। बताते हैं कि 7 साल पहले उनके भाई प्रमोद मिश्र की भी मौत लीवर कैंसर से हुई थी। पड़ताल में पता चला कि गांव में कैंसर से पहली मौत दो बार कांग्रेस विधायक रहे महेन्द्र झा आजाद की मां और पत्नी की हुई थी। आज भी गांव के सात लोग कैंसर का इलाज करा रहे हैं।

एक सप्ताह पहले दिल्ली के सफदरजंग अस्पताल में बच्चन झा का निधन हुआ है। पूर्व मुखिया कहते हैं कि पिछले साल एनजीओ द्वारा स्वास्थ्य शिविर लगाकर लोगों की जांच कराई गई लेकिन सरकारी पहल अभी तक नहीं हुई। पिछले साल अप्रैल में चापाकलों का पानी जांच के लिए पटना भेजा गया था, पर रिपोर्ट भी नहीं बताई गई।

महिनाम से पांच किमी दक्षिण पररी गांव में भी आर्सेनिक जनित कैंसर लोगों की जान ले रहा है। बिरोल प्रखंड के इस गांव से 35-36 लोगों के मरने की सूचना है। यह मामला 2006 में तब प्रकाश में आया जब गांव के तत्कालीन मुखिया धीरेंद्र ठाकुर ने मुख्यमंत्री के जनता दरबार में उस गांव के दो दर्जन लोगों के मरने की शिकायत की थी। मुख्यमंत्री के आदेश पर उस समय 26 नवंबर को पटना से एक जांच टीम गई। गांव में 32 चापाकलों के नमूनों की जांच कराई तो आर्सेनिक की मात्रा काफी ज्यादा मिली। बाद में सरकार ने सौर उर्जा चालित दो वाटर ट्रीटमेंट प्लांट भी लगाए। कुछ दिनों तक लोगों ने इसके पानी का इस्तेमाल किया लेकिन दूर होने के कारण अब इसका इस्तेमाल लगभग बंद हो गया।

महिनाम से करीब 30 किलोमीटर दूर बहेड़ी के पघारी गांव में पिछले एक दशक में 34 लोगों की मौत कैंसर से हो चुकी है। गांव के प्रदीप चौधरी मानवाधिकार संरक्षण प्रतिष्ठान के जिलाध्यक्ष हैं, उनके अनुसार गांव में कैंसर से मौत का सिलसिला वर्ष 2005 से शुरू हुआ। 2013 में मीडिया रिपोर्ट आने के  बाद गांव से पेयजल के नमूने लेकर जांच को भेजा गया जिनमें आर्सेनिक ज्यादा पाया गया।

पानी संग खून में भी आर्सेनिक ज्यादा: महावीर कैंसर संस्थान की ओर से समस्तीपुर, वैशाली, भोजपुर और बक्सर जिलों से पानी के 800 सैंपल लिए गए। अधिकांश में आर्सेनिक की मात्रा ज्यादा पायी गई। तीन जिलों के 49 कैंसर मरीजों के खून की जांच में भी आर्सेनिक की मात्रा ज्यादा मिली। हाजीपुर के 18, भोजपुर के 11 तथा बक्सर के 10 कैंसर मरीजों पर उक्त अध्ययन में उनके खून में आर्सेनिक की मात्रा 10 से 174 पार्ट पर बिलियन तक पायी गई जबकि मानक .002 पार्ट पर बिलियन ही है।

तालाबों में जलकुंभी से आर्सेनिक की मात्रा जल में बढ़ रही है। आर्सेनिक से गॉल ब्लाडर, लीवर व प्रोस्टेट के कैंसर सामने आ रहे हैं। कीटनाशक से ब्रेस्ट कैंसर बढ़ रहा है।
-डॉ. जेके सिंह, कैंसर रोग विशेषज्ञcancer-04-02-2016-1454560996_storyimage

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