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सूर्य प्रत्यक्ष देवता हैं। सुबह ब्रह्रमा, दोपहर विष्णु और शाम को रुद्र रूप धारण करते हैं। माघ मास के शुक्ल पक्ष की अचला सप्तमी, जिसे पूरे साल की सप्तमी में सर्वश्रेष्ठ माना जाता है, रविवार 14 फरवरी को है। अचला सप्तमी अगर रविवार को हो तो उसे भानु सप्तमी भी कहा जाता है। सात जन्म के पाप को दूर करने के लिए रथारूढ़ सूर्यनारायण की पूजा, जिसे रथ सप्तमी भी कहा जाता है, भी इसी दिन की जाती है।

आज के ही दिन सूर्य ने अपने प्रकाश से सृष्टि को प्रकाशित किया था। इसी दिन भगवान सूर्य सात घोड़ों के रथ पर सवार हो कर प्रकट हुए थे। आज के दिन हर हाल में तेल और नमक का त्याग करना चाहिए। भविष्य पुराण में इस सप्तमी की बड़ी महिमा गाई गई है। सप्तमी तिथि की सुबह जब सूर्य देव की लालिमा फैल रही हो तो नदी या सरोवर पर जाकर स्नान करें। इस दिन अपने-अपने गुरु को वस्त्र खासकर अचला (अंगोछे जैसा गले में धारण किया जाने वाला वस्त्र), तिल, गाय और दक्षिणा देनी चाहिए। हां, इस सप्तमी को जो व्यक्ति सूर्य की पूजा करके मीठा भोजन अथवा फलाहार करता है, उसे पूरे साल सूर्य की पूजा करने का पुण्य प्राप्त होता है।

भविष्य पुराण में कहा गया है कि यह व्रत सौभाग्य, सुंदर रूप और उत्तम संतान प्रदान करता है। धर्मराज युधिष्ठर को श्रीकृष्ण ने इस व्रत के बारे में बताया था। एक गणिका इन्दुमती ने जीवन में कभी कोई दान-पुण्य नहीं किया था। वशिष्ठ मुनि के पास मुक्ति पाने का उपाय पूछने पर गणिका को मुनि ने कहा- माघ मास की सप्तमी को अचला सप्तमी का व्रत करो।

षष्ठी के दिन एक बार भोजन करो। सप्तमी की सुबह स्नान के पूर्व दिवोदास के मतानुसार आक के सात पत्ते सिर पर रखें और सूर्य का ध्यान करके गन्ने से जल को हिला कर ‘नमस्ते रुद्ररूपाय रसानां पतये नम:। वरुणाय नमस्तेअस्तु।’ मंत्र पढ़ कर दीपक को बहा दें।

स्नान के बाद सूर्य की अष्टदली प्रतिमा बना कर शिव और पार्वती को स्थापित करें और विधिपूर्वक पूजन कर तांबे के पात्र में चावल भर कर दान करें। गणिका ने मुनि के बताए अनुसार माघी सप्तमी का व्रत किया। इसके पुण्य से देह त्याग के बाद इन्द्र ने उसे अप्सराओं की नायिका बना दिया।जो लोग नदी में स्नान नहीं कर सकते, वे पानी में गंगाजल डाल के स्नान कर सकते हैं।

(सार्थक मिश्र)

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