पश्चिम बंगाल में लोगों ने एक हिन्दू परिवार का सिर्फ इसलिए बहिष्कार कर दिया क्योंकि उन्होंने परिवार के सदस्य के शव का दाहसंस्कार करने की बजाए उसे दफना दिया था. मामला उत्तर 24 परगना जिले में भारत-बांग्लादेश सीमा के पास हरीशपुर गांव का है. गांव में रहने वाले बिदेश सरकार और नकुल चंद्र सेन के परिवारों को बहिष्कार करने का फैसला स्थानीय लोगों ने लिया है.

पूरी की मां की अंतिम इच्छा
पिछले साल बिदेश सरकार की मां का निधन हो गया था. उन्होंने अपनी मां की अंतिम इच्छा पूरी करने के लि उनके शव को घर के आंगन में ही दफना दिया. हालांकि उन्होंने हिन्दू पंडितों को बुलाकर मटुआ परंपरा से उनका अंतिम संस्कार कराया था. सरकार ने कहा, ‘गांववालों ने मुझे कहा कि क्योंकि मैंने अपनी मां को दफनाया है, इसलिए इसे हिन्दू रिवाज के तहत जायज अंतिम संस्कार नहीं माना जाएगा. मैंने उन्हें बताया कि हमने मटुआ समुयाद के तरीकों से ही अंतिम संस्कार किया था. लेकिन फिर भी उन्होंने हमारा बहिष्कार करने का फैसला किया.’

क्या है मटुआ समुदाय
मटुआ समुदाय के लोग श्री हरीचंद ठाकुर के अनुयायी हैं, जो एक हिन्दू धार्मिक नेता थे और 1947 के बाद बांग्लादेश से पश्चिम बंगाल में आकर बसे हिन्दू प्रवासियों के बीच खासे चर्चित हैं. बिदेश सरकार के रिश्तेदारों और उनके पड़ोसी नकुल चंद्र सेन ने उनका साथ दिया तो गांववालों ने उनका भी बहिष्कार कर दिया.

मटुआ समाज में ‘समाधी’ की परंपरा
बिदेश के पिता कालीपाड़ा सरकार ने बताया कि मटुआ रिवाजों के मुताबिक लोगों को दफनाया भी जा सकता है और उसे ‘समाधी’ कहा जाता है. उन्होंने कहा, ‘गांववाले आए और पूछा कि हमने उन्हें क्यों दफनाया है. हमने बताया कि इसे समाधी कहते हैं.’

गांववालों की एक महासभा में फैसला करने के बाद हरीशपुर गांव में सरकार और सेन के पोस्टर लगाकर सबको ये बताया गया है कि हिन्दू समाज का अपमान करने के लिए इनका बहिष्कार कर दिया गया है.

पूर्व IPS ने बताया मूल अधिकारों का उल्लंघन
बंगाल के पूर्व आईपीएस अधिकारी नजरुल इस्लाम एक एनजीओ के लोगों के साथ पीड़ित परिवार से मिलने पहुंचे और इस घटना की निंदा की. उन्होंने कहा कि ये मूल अधिकारों के उल्लंघन का मामला है. इस्लाम ने कहा, ‘संविधान ने हम सभी को कुछ मूलभूत अधिकार दिए हैं. गांववालों को ये तय करने का कोई अधिकार नहीं है कि परिवार को क्या सुविधाएं मिलनी चाहिए और क्या नहीं.’

टस से मस नहीं गांववाले
हालांकि गांववाले समझने को तैयार नहीं हैं और उनका कहना है कि बार-बार चेतावनी के बावजूद सरकार ने सनातन हिन्दू धर्म का अपमान किया है. गांव में रहने वाले सुभाष मंडल ने कहा, ‘उन्होंने हिन्दू रिवाजों का पालन नहीं किया और कहा कि वो गीता और महाभारत में विश्वास नहीं करते. हमें मजबूरी में उनके खिलाफ ये कार्रवाई करनी पड़ी.’

सरकार की मां के निधन के बाद शोक के लिए उनके घर पर आए गांववालों ने दफनाने के फैसला का विरोध किया था. जब सरकार ने उनकी बात नहीं मानी तो गांववालों ने भी अंतिम संस्कार में हिस्सा लेने से इनकार कर दिया. कुछ रिश्तेदारों और पड़ोसी नकुल चंद्र सेन की मदद से सरकार ने अपनी मां को घर के आंगन में दफनाया.

पुलिस में शिकायत के बाद सामने आया मामला
गांववाले इस बात से और भड़क गए कि सरकार ने मटुआ परंपरा में होने वाले श्राद्ध करने की बजाए शोकसभा बुलाने का फैसला किया. गांववालों का कहना है कि शोकसभा में आए कुछ लोगों ने भी हिन्दू परंपराओं की आलोचना की. गांववालों की तरफ से बहिष्कार किए जाने के बाद सरकार 8 जनवरी को स्वरूपनगर पुलिस स्टेशन पहुंचे और शिकायत दर्ज कराई. हालांकि पीड़ित परिवार का कहना है कि पुलिस ने भी हालात को सामान्य करने के लिए कुछ खास नहीं किया और हो सकता है कि उन्हें गांव छोड़ने के लिए मजबूर किया जाए.

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