परब्रह्म की उस मानसिक इच्छा का, जो संसार की सृष्टि में प्रवृत्त होती है, मूर्तरूप ही ‘काम’ है। जब यह सृष्टि रचना के अनुकूल होती है तो विष्णु और शिव का साक्षात् रूप कही जाती है। गीता में श्रीकृष्ण ने कहा है कि मैं जीवमात्र में धर्म के अविरुद्ध रहने वाला ‘काम’ हूं, परंतु जो व्यक्तिगत इच्छा धर्म के विरुद्ध जाती है, वह अपदेवता है। काम का एक रूप धर्म के अविरुद्ध जाने वाला है, दूसरा धर्म के विरुद्ध जाने वाला। पहला साक्षात् विष्णु रूप है। ब्रह्मसंहिता में कहा गया है कि जो आनंद और चेतनामय रस से मन को भरता है, प्राणियों के मन में ‘स्मर’ या ‘काम’ रूप से प्रतिफलित होता है और इस प्रकार अशेष भुवनों को जीत कर नित्य विराजमान है, उस आदिपुरुष गोविंद को मैं स्मरण करता हूं (46)।

मत्स्यपुराण में ‘कामनाम्ना हरेचर्चा’ कह कर बताया गया है कि वस्तुत: ‘काम’ नामक हरि की ही पूजा की जाती है, वह साक्षात् विष्णु ही हैं। श्री कृष्ण गायत्री और काम गायत्री में कोई फर्क नहीं है। परंतु इसका एक दूसरा रूप भी है, जो व्यक्ति के विवेक को दबा देता है। पश्चिम में ‘क्यूपिड’ नामक देवता (या अपदेवता) को अंधा माना गया है, क्योंकि वह विवेक को नष्ट करता है, मनुष्य को अंधा बना देता है। शिव ने इसी मादक मदन देवता को भस्म किया था। शिव ने इसी को ज्ञान के नेत्र उन्मीलित करके भस्म किया था।

संसार की लगभग सभी सभ्य आदिम जातियों में वसंतकाल में उद्दाम यौवनोन्माद के उत्सव पाए जाते हैं। कहीं-कहीं ये उत्सव बहुत ही स्थूल यौन वासना के रूप में पाए जाते हैं, कहीं संयत और सुरुचिपूर्ण रूप में। प्राचीन भारत में इस उत्सव के उद्दाम रूप को संयत, सुरुचिपूर्ण रूप में संवारने का सफल प्रयत्न किया गया था। आदिम सहजात वृत्तियों को सुरुचिपूर्ण, संयत और कल्याणमुखी बना कर ही मनुष्य ‘मनुष्य’ बना है, नहीं तो वह पशु ही रह गया होता। प्राचीन भारत के मदनोत्सव में मनुष्य के इस प्रयत्नशील तत्व की ही चरितार्थता प्राप्त होती है।vishnu-08-02-2016-1454948850_storyimage

LEAVE A REPLY