आज बसंत पंचमी है। माना जाता है कि आज से मौसम फिर करवट लेता है। प्रकृति भी इस मौसम में अपने पूरे शबाब पर दिखती है। तभी तो बसंत को ऋतुओं का राजा कहा जाता है। प्रकृति और कवि हृदय का भी अनूठा जुड़ाव होता है। कवि रवीन्द्र नाथ टैगोर ने भी साल 1909 में बंग-दर्शन में वसंत पंचमी पर अपनी भावनाओं को कलमबद्ध किया था। आइए रवीन्द्र बाबू की यादों में जानते हैं बसंत के प्रकृति से अनूठे लगाव की 10 अहम बातेंः

1. अभिव्यक्ति के इतिहास में मनुष्य का एक अंश तो पेड़-पौधों के साथ जुड़ा हुआ है। हमलोग किसी समय शाखामृग थे, इसका परिचय हमारे स्वभाव में मिलता है। लेकिन उसके भी बहुत समय पहले किसी आदि-युग में हम निश्चय ही वृक्ष थे, यह क्या हम भूल सकते हैं? उस आदिकाल की सूनी दुपहरी में, जब वसंती हवा हमारे पेड़-पौधों में किसी को रत्ती भर खबर दिए बिना अचानक आ पड़ती, तब हम क्या लेख लिखते थे? या देश का उपकार करने निकलते थे? तब हम सारे दिन खड़े-खड़े गूंगों की तरह, बौड़ों की तरह कांपते रहते थे, हमारा शरीर झर-झर, मर-मर कर पागलों की तरह गाता रहता था, हमारी जड़ से लेकर शाखाओं की टहनियां तक रस के प्रवाह से भीतर ही भीतर चंचल हो उठती थीं। उस आदिकाल का फागुन-चैत इसी तरह रस भरे आलस्य और अर्थहीन प्रलाप में कट जाता था। उसके लिए किसी के सामने कोई जवाबदेही नहीं करनी पड़ती थी।

2. अभिव्यक्ति के अंतिम कोष्ठ में आकर मनुष्य के अनेक भाग हो गए। जड़ भाग, वनस्पति भाग, पशु भाग, बर्बर भाग, सभ्य भाग, देव भाग इत्यादि। इन अलग-अलग भागों की एक-एक विशेष जन्म-तु है। किस तु में कौन भाग पड़ता है, इसके निर्णय का भार मैं न लूंगा। मैं किसी एक सिद्धांत को आखिर तक ले चल सकूंगा, ऐसी प्रतिज्ञा करने पर बहुत झूठ बोलना पड़ता है। आज पड़े-पड़े सामने की ओर ताकते हुए जो कुछ सहज मन में आ रहा है, उसको लिखने बैठा हूं।

3. लंबी सर्दी के बाद आज दोपहर निचाट मैदान में नव वसंत के सांस छोड़ते ही मैं अपने भीतर मनुष्य जीवन का एक भारी असामंजस्य अनुभव कर रहा हूं। विपुल के साथ, समग्र के साथ उसका सुर नहीं मिल पा रहा है।
जाड़े में मेरे ऊपर संसार के जो सब तकाजे थे, आज भी ठीक वही सब चल रहे हैं। तु बदलती है, लेकिन काम एक ही रहता है। तु परिवर्तन के ऊपर मन की जीत का झंडा गाड़कर उसे मुर्दा कर देने में न जाने कौन-सी ऐसी बहादुरी है। मन बड़ा अजीब है, वह क्या नहीं कर सकता? वह दखिनी हवा की कुछ भी परवाह न करके सरपट बड़े बाजार की तरफ दौड़ सकता है। माना कि दौड़ सकता है, लेकिन क्या इसीलिए दौड़ना जरूरी है? इससे दखिनी हवा रुक तो नहीं जाएगी, नुकसान किसका होगा?

4. यही कुछ दिन हुए हमारे आंवले, महुए और साल की डाल से पत्ते झड़ रहे थे। फागुन दूर से आए हुए बटोही के सामने जैसे द्वार पर आकर बस दम लेने को बैठा हो, और हमारी वन-श्रेणी पत्ते गिराना बंद करके रातोंरात नई-नई कोंपलें उगाने में लग गईं। हम मनुष्य हैं, हममें वैसा बन जाने की शक्ति नहीं है। बाहर चारों ओर जब हवा बदलती है, पत्ते बदलते हैं, रंग बदलते हैं, तब भी हम बैल की तरह पुरानी चीजों का भार ढोते हुए वैसे ही रास्ते की धूल उड़ाते पीछे-पीछे चलते रहते हैं। गाड़ीवाला पहले जिस लकड़ी से हमारे पांजर को ठेलता रहता था, अब भी वही लकड़ी है।

5. हाथ के पास पंजिका नहीं है। अनुमान करता हूं कि आज फागुन की पंद्रह या सोलह तारीख होगी, वसंत-लक्ष्मी आज षोडशी किशोरी है।…लेकिन इन सब बातों को सोचने के लिए हमारे पास छुट्टी नहीं है। मेघा की पुकार आने पर शास्त्रों का अध्ययन वर्जित था, वर्षा के समय परदेशी घर लौट आते थे। मैं यह नहीं कह सकता कि बदली के दिन पढ़ाई नहीं हो सकती या वर्षा के समय विदेश में काम करना असंभव है। मनुष्य स्वाधीन है, स्वतंत्र है, जड़-प्रकृति का आंचल नहीं पकड़े है, लेकिन शक्ति है क्या, इसीलिए बराबर विपुल प्रकृति के साथ विद्रोह करके चलना होगा।

6. वसंत के दिन विरहिणी का मन हाहाकार करता है, यह बात हमने प्राचीन काव्यों में पढ़ी है। प्रकृति के साथ अपने मन का संपर्क हमने ऐसा तोड़ लिया है। मनुष्य क्या बस इस अजस्रता के स्त्रोत को रूंधता रहेगा? अपने को खिलाएगा नहीं, फलाएगा नहीं, दान करना न चाहेगा? क्या हम ऐसे निरे मनुष्य हैं? क्या हम वसंत के रहस्यमय रस-संचार विकलित तरु-लता-पल्लव कोई नहीं? वे जो हमारे घर के आंगन को छाया से ढककर, गंध से भरकर, बांहों से घेरकर खड़े हों, वे क्या हमारे इतने बेगाने हैं कि जब वे फूल बनकर खिल उठेंगे, तब हम अचकन पहनकर दफ्तर जाएंगे?

7. मैं आज पेड़-पौधों के साथ अपनी पुरानी आत्मीयता स्वीकार करूंगा। आज मैं किसी तरह न मानूंगा कि व्यस्त होकर काम करते घूमना ही जीवन की अद्वितीय सार्थकता है। आज हमारी उसी युग-युगांतर की बड़ी दीदी वन लक्ष्मी के घर भैया दूज का निमंत्रण है। वहां पर आज तरु-लता से बिल्कुल घर के आदमी की तरह मिलना होगा। आज छाया में लेटकर सारा दिन कटेगा, मिट्टी को आज दोनों हाथों से बिखेरूंगा, समेटूंगा, वसंती हवा जब बहेगी, तब उसके आनंद को मैं हृदय की पसलियों में बहने दूंगा, ताकि वहां पर कोई ऐसी आवाज न हो, जिसकी भाषा पेड़-पौधे नहीं समझते हों।

8. इसी तरह चैत्र के अंत तक मिट्टी, हवा और आकाश के बीच जीवन को नरम करके, हरा करके बिखेर दूंगा, प्रकाश में, छाया में चुपचाप पड़ा रहूंगा। लेकिन हाय, कोई काम बंद नहीं होता, हिसाब की कॉपी बराबर खुली रहती है। मैं नियम की मशीन में, कर्म के फंदे में पड़ गया हूं। अब वसंत के आने से ही क्या, जाने से ही क्या?

9. मनुष्य समाज से मेरा सविनय निवेदन है कि यह स्थिति ठीक नहीं। इसमें मनुष्य का कोई गौरव नहीं कि वह विश्व से अलग रहे। मनुष्य इसलिए बड़ा है कि उसमें विश्व की सब विविधता, सब वैचित्र्य हैं। मनुष्य जड़ के साथ जड़, तरु-लता से तरु-लता, पशु-पक्षी के साथ पशु-पक्षी बन जाता है। प्रकृति के राजमहल के तमाम दरवाजे उसके लिए खुले हैं, लेकिन खुले रहने से ही क्या होगा? एक-एक तु में जब एक-एक महल से उत्सव का निमंत्रण आता है, तब मनुष्य उसको स्वीकार न करके अपनी आढ़त की गद्दी पर ही पड़ा रहे, ऐसा बड़ा अधिकार उसे क्यों मिला? पूरा मनुष्य बनने के लिए उसे सभी कुछ होना पड़ेगा।

10. हाय रे समाज-स्तंभ के पक्षी! आकाश का नीला रंग आज विरहिणी की आंखों जैसा सपनों में डूबा हुआ है, पत्ते का हरा रंग आज तरुणी के कपोल जैसा ताजा-ताजा है, वसंत की हवा आज मिलन के आग्रह जैसी चंचल है, तब भी तेरे डैने आज बंद हैं, तब भी तेरे पैरों में कर्म की जंजीर है- यही क्या मानव जन्म है!

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