वसंती मौसम ने भगवान और भक्तों को अपने रंग में रंग लिया है। नटवर नंद किशोर के गर्म वस्त्र, भोग संग राग बदल गए हैं। हीटर की गर्म हवा और अंगीठी का दहकना बंद हो गया है। सनील की रजाई, गद्दे, कंबल, शाल, स्वेटर, मखमली सेज, केसरिया दूध, सौंठिया अगले साल तक के लिए संभालकर रख दिए गए हैं। रसिकों ने गर्मी देने वाले राग त्याग मस्ती भरे चाचर काफी राग की तान छेड़ दी है। रंगन रंग हो हो होरी एै की धुन वातावरण को रंगीन बना रही है।

प्रकृति के बदलाव के अनुसार भगवान के वस्त्र-आभूषण एवं राग भी बदलते हैं। वसंती ऋतु का आगमन हुआ तो प्रिया-प्रियतम ने भी अपने गर्म वस्त्र उतार दिए। खान-पान में भी बदलाव आ गया। परंपरा के तहत रसिक समाज ने भी होली के फागों का गायन शुरू कर दिया है। गायक अब चाचर राग से भगवान को आनंद दे रहे हैं। ब्रज की संस्कृति, गायन-वादन में जन्मे और ब्रजभाषा के धमार, ध्रुपद, काफी राग की तरंग भगवान संग भक्तों को मुग्ध कर रहे हैं।

मथुरा स्थित राजाधिराज द्वारिकाधीश, दाऊजी मदन मोहन जी, छोटे-बड़े दाऊजी, वृंदावन के राधा वल्लभ जी एवं अलौकिक टटिया स्थान में इस गायन-वादन परंपरा का नित्य पालन हो रहा है। श्रीकृष्ण जन्मभूमि में भी वसंती वातावरण बन गया है। संयुक्त अधिशासी राजीव श्रीवास्तव बताते हैं कि केशवदेव के वस्त्र पीतांबर हो गए हैं। शाल स्वेटर हटा दिए हैं। फाग गाए जा रहे हैं और गर्मी प्रदान करने वाले भोग भी बंद कर दिए हैं।

सेवायत धीरज गोस्वामी ने बताया कि गोपीनाथ जी मंदिर में अंगीठी, हीटर, गर्म भोजन, वस्त्र बंद कर दिए हैं। पीले वस्त्र, भोग लगा रहे हैं। श्री हरिदास की परंपरा के प्राचीन टटिया स्थान में महंत श्रीराधा विहारी दास के सानिध्य में गायन-वादन, भोग-राग का वासंती दौर मोहिनी विहारी के साथ भक्त समाज को भी आनंदित कर रहा है।

आचार्य राधा विहारी गोस्वामी बताते हैं कि यह दौर होली के दूसरे दिन धूल तक नित्य चलेगा और उसके बाद फिर नई परंपरा आरंभ होगी। होली का चालीस दिनी पर्व आ रहा है, इसका प्रमाण ब्रजधाम के चौराहे दे रहे हैं। यहां होली का डांढ़ा गाड़ दिया गया है।  मंदिरों के अंदर और बाहर अबीर गुलाल के बन रहे छोटे-छोटे बादल भी फागुन की बयार का एहसास कराने लगे हैं। holi-14-02-2016-1455439628_storyimage

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