दो सौ से ज्यादा हत्याओं का आरोपी रहा दुर्दांत दस्यु सरगना शिवकुमार पटेल उर्फ ददुआ मौत के आठ साल बाद फिर सुर्खियों में है। फतेहपुर की खागा तहसील के गांव नरसिंहपुर करबहा के राम जानकी मंदिर में रविवार को ददुआ और उसकी पत्नी केतकी देवी उर्फ बड़ी की मूर्तियां स्थापित कर दी गई हैं। वहां पहले ही दिन एक लाख से अधिक लोग दर्शन को पहुंचे। सैकड़ों लोगों ने जेवर उतारकर मूर्तियों को अर्पित किए।

एक सप्ताह पहले इसी मंदिर में ददुआ के माता-पिता की मूर्तियां लगाई गई थीं। सवा दो सौ से अधिक हत्याएं, अपहरण, डकैती व लूट के मामलों में वांछित रहे ददुआ की मूर्ति स्थापना ने जहां एक नई बहस को जन्म दिया है, वहीं इसके राजनीतिक निहितार्थ की भी तलाश है। यूपी के कैबिनेट मंत्री शिवपाल सिंह यादव के भी आयोजन में शरीक होने की घोषणा की गई थी लेकिन ऐन वक्त पर कार्यक्रम स्थगित हो गया।

ददुआ के भाई व मूर्ति स्थापना में अहम रोल निभाने वाले सपा के पूर्व सांसद बाल कुमार पटेल ने कहा कि मंदिर उनकी निजी संस्था हैं, हम उसमें पूर्वजों की मूर्ति स्थापित कर रहे हैं, तो किसी को ऐतराज नहीं होना चाहिए? मंदिर पर ग्रामीणों द्वारा जेवर चढ़ाने के सवाल पर मंदिर प्रबंधकों का कहना था कि इलाके में ददुआ की छवि राबिनहुड की रही थी। वह गरीब लड़कियों की शादियां ही नहीं कराता था बल्कि खुलकर पैसा भी खर्च करता था। इस कारण गरीब ग्रामीण भी श्रद्धा के अनुसार मूर्तियों पर जेवर चढ़ा रहे हैं।

ददुआ ने ही कराया मंदिर का निर्माण
नरसिंहपुर कबरहा के जिस शिवहरे रामजानकी मंदिर में डकैत परिवार की मूर्तियां स्थापित की गई है, उसका निर्माण स्वयं ददुआ ने कराया था। 1992 में फतेहपुर के हरसिंहपुर कबरहा के पास पुलिस मुठभेड़ के दौरान ददुआ फंस गया था। परिजनों के मुताबिक तब ददुआ ने मन्नत मानी थी कि यदि वह बच गया तो कबरहा के हनुमान मंदिर को विशाल और भव्य कराएगा।

इसी क्रम में इस भव्य मंदिर का निर्माण कराया गया। परिजन और मंदिर का निर्माण कराने वाले लागत पर खुलकर बोलने को तैयार नहीं है लेकिन चर्चाओं के अनुसार ददुआ, उसकी पत्नी व माता-पिता की मूर्तियां पर लगभग 80 लाख रुपये लागत आई है। मंदिर जीर्णोद्धार पर भी लाखों रुपये खर्च किए गए हैं। मंदिर फतेहपुर मुख्यालय से 80 किमी दूर है। चित्रकूट और कौशाम्बी की सीमा पर स्थित इस गांव के लिए धाता तक रोडवेज बसों के जरिए पहुंचा जा सकता है। यहां से नरसिंहपुर कबरहा तक का लगभग 3.5 किमी. रास्ता टेम्पो या स्थानीय सवारियों के जरिए तय किया जा सकता है।

खुला ददुआ की शक्ल का राज
ददुआ के जिंदा रहते पुलिस के पास उसकी काफी पुरानी सिर्फ एक फोटो थी। उसी के आधार पर पुलिस ददुआ की तलाश करती थी। मंदिर में मूर्तियां स्थापित होने के बाद ही अधिकांश लोगों को सही शक्ल का पता चला। 22 जुलाई 2007 को तत्कालीन एसटीएफ पुलिस अधीक्षक अमिताभ यश की टीम ने ददुआ को चित्रकूट के कुशमही गांव के पास हुई मुठभेड़ में मार गिराया था। बाद में गांव वालों ने ददुआ की पहचान की थी।

पहला मुकदमा भैंस चोरी का 
चित्रकूट के देवकली गांव निवासी शिवकुमार पटेल उर्फ ददुआ के खिलाफ पहला मुकदमा 1975 में भैंस चोरी का दर्ज किया गया था। इसके बाद 1978 में कौशाम्बी के पश्चिम सरीरा इलाके में डकैती के मामले में जेल जाने के बाद वह कभी पुलिस की पकड़ में नहीं आया। बाद में उसका आतंक बुंदेलखण्ड के कई जिलों में फैल गया।

डकैतों के मंदिर का चलन
उत्तर प्रदेश के साथ-साथ मध्य प्रदेश और राजस्थान में डकैतों की पहचान चिरस्थायी बनाए रखने के प्रयास होते रहे हैं। कहीं मंदिर बनाए गए हैं तो कहीं स्वागत द्वार। वर्ष 1935-55 के बीच चंबल में सक्रिय रहे डकैत मानसिंह और उनके साथी रूपा की मूर्तियां आगरा से 60 किमी दूर स्थित खेड़ा राठोर गांव में स्थापित है। यहां पूरे विधि-विधान से पूजा-पाठ होता है। चंबल घाटी में आतंक का पर्याय रहे दस्यु सरगना मोहर सिंह, माधो सिंह, तहसीलदार सिंह के साथ-साथ मलखान सिंह के भी गांव में पहचान के लिए स्मारक बने हैं।

वीरपप्न का नहीं बना कोई स्मारक
लगभग दो सौ लोगों की हत्या और सैकड़ों हाथियों को मारने वाले चंदन तस्कर वीरप्पन ने 40 लोगों के गिरोह के साथ लंबे समय तक जंगल में  अपनी बादशाहत बनाए रखी लेकिन उसका कोई मंदिर या स्मारक नहीं है। राजनीतिक संरक्षण में पले-बढ़े डकैत निर्भय सिंह गुर्जर, फूलन सिंह, सीमा परिहार ने अपराध की दुनिया के इतर अपनी पहचान तो बनाई लेकिन स्थायी पहचान की कोशिश उनके परिवारीजनोें ने भी नहीं किया।

चित्रकूट में थी ददुआ की बादशाहत
लगभग तीन दशक तक ददुआ उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश पुलिस की नाक में दम किए रहा। चित्रकूट के पाठा जंगलों में तो उसकी बगैर इजाजत के एक भी तेंदुपत्ता तोड़ना संभव न था। तेंदुपत्ता का इस्तेमाल बीड़ी बनाने में किया जाता है। ददुआ ने पहली बार गांव देवकली में पारिवारिक पट्टीदार की हत्या कर बगावत की थी पर वह सुर्खियों में तब आया जब उसने वर्ष 1985 में रामूपुरवा नरसंहार किया। इसके बाद वह पाठा के रसूखदारों की संगत में रह कर तेंदू पत्ता के कारोबार में मदद करने लगा।

80के दशक में उसने मजबूत गैंग बना लिया और उन्हीं रसूखदारों से ही रंगदारी वसूलने लगा। खौफ कायम करने के लिए ददुआ ने दो सौ से अधिक हत्याएं कीं। उस पर दो सौ मामले दर्ज हुए पर आखिर में यह आंकड़ा सिर्फ डेढ़ सौ तक सिमट गया। डर की वजह से पीडि़त परिवार पुलिस के पास जाने से कतराते थे। इसके चलते कई हत्याओं की तो रिपोर्ट तक दर्ज नहीं हुई। मानिकपुर के सौखीलाल हों या फिर लौघटा का गुप्ता परिवार का एक युवक, इनकी हत्या का राज आज तक नहीं खुला। ददुआ को पकड़ने के लिए मानिकपुर के जंगलों में नगालैंड की पैरामिलिट्री फोर्स तक आई, मगर उसे भी वापस जाना पड़ा।

नेताओं का भस्मासुर बना तो हुआ खत्म
कहा जाता है कि वर्ष 2007 के पहले तक ददुआ का लगाव बसपा की ओर रहा। चर्चा रही कि हर चुनाव में उसके फरमान चले। उस समय नारा प्रसिद्ध हुआ – “वोट पड़ेगा हाथी पर वरना गोली खाओ छाती पर”। उसके एक फरमान पर प्रत्याशियों की तकदीर बदल जाती थी। 2007 में ददुआ ने सपा के समर्थन में फरमान जारी किया था। कहते हैं कि बसपा को यह बात नागवार गुजरी थी। कुछ लोग कहते हैं कि बसपा से उसकी ठन गई तो सरकार बनते ही तीन माह में तीन दशक के खौफ का अंत हो गया।

चुनाव आयोग की टेढ़ी हो गई थीं निगाहें
दरअसल विधानसभा चुनाव में सपा के समर्थन में ऐलान करने की शिकायत चुनाव आयोग को मिली। आयोग ने तत्कालीन डीजीपी जीएल शर्मा और एडीजी कानून-व्यवस्था अतुल को चित्रकूट, बांदा और आसपास फैले ददुआ के आतंक को कम करने और निष्पक्ष व स्वतंत्र चुनाव कराने की सख्त हिदायत दी। अधिकारी दिल्ली भी बुलाए गए। चुनाव के दौरान की एसटीएफ की पूरी 22 सदस्यीय टीम को 22 अप्रैल 2007 को चुनाव आयोग के कहने पर बांदा-चित्रकूट के जंगलों में कांबिेंग के लिए भेजा गया। आपरेशन ददुआ इतना गोपनीय रखा गया कि किसी को कानों-कान भनक नहीं लगी।

इसी के साथ से ददुआ को घेरने का सिलसिला शुरू हो गया। एसटीएफ ने न केवल मुखबिर बनाए और यहां तक की पान वालों और गुमटी वालों को सूचनाएं देने के लिए मुफ्त में मोबाइल तक बांटें गए। उसकी मौत के बाद उसके गिरोह में रहे ठोकिया और बलखडि़या ने अलग-अलग गैंग बना लिए। पुलिस मुठभेड़ में अब यह दोनों भी मारे जा चुके हैं। वहीं, कभी ददुआ के दाहिने हाथ रहे राधे, तहसीलदार और गोटर समेत कई डाकू बांदा जेल में बंद हैं।

मूर्ति के पीछे राजनीतिक लाभ लेने की मंशा
कबरहा स्थित हनुमान मंदिर में ददुआ की मूर्ति स्थापना के पीछे राजनीति कनेक्शन से इनकार नहीं किया जा सकता। जिले में करीब 1.32 लाख कुर्मी मतदाता हैं। सपा, बसपा समेत सभी पार्टियों की इन पर नजर है। दबी जुबान से इलाके के लोग मूर्ति स्थापना में उत्तर प्रदेश में सत्तारूढ़ समाजवादी पार्टी की मौन सहमति मानते हैं। फतेहपुर कुर्मी बहुल क्षेत्र है। यहां से वर्तमान में केन्द्रीय खाद्य प्रसंस्करण राज्यमंत्री साध्वी निरंजन ज्योति भाजपा की सांसद हैं।

साध्वी ने सपा के प्रत्याशी और पूर्व सांसद राकेश सचान को हराकर यह सीट जाती है। ददुआ के भाई बाल कुमार पटेल मिर्जापुर से सांसद रहे हैंं। माना जा रहा है कि राकेश सचान की पकड़ कमजोर होते देख कुमार की नजर इस क्षेत्र पर है। लोगों का यह भी कहना है कि लोकसभा चुनाव में बाल कुमार की करारी हार, फिर जिला पंचायत अध्यक्ष पद चुनाव में कुर्मी बिरादरी के साथ न देने से भी ददुआ की मूर्ति स्थापित करने की योजना बनाई गई।

राजनीति में ददुआ का प्रभाव
ददुआ का फतेहपुर और चित्रकूट की राजनीति में तीन दशक तक दबदबा रहा। सांसद और विधायक उसके फरमान पर जीतते थे। रसूख का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि बसपा के पूर्व सांसद, पूर्व मंत्री और विधायक पर दस्यु संरक्षण के मामले दर्ज किए गए थे। अब भी ददुआ परिवार की गिनती सपा के रसूखदार नेताओं में होती है। ददुआ का राजनीति में हस्तक्षेप वर्ष 1985 से शुरू हुआ, जब कांग्रेस प्रत्याशी ने प्रदेश सरकार से यहां डकैतों के हस्तक्षेप की शिकायत की थी। इसके बाद ददुआ ने प्रधानी चुनाव में करीबियों व परिजनों को उतारा और ताजपोशी कराई। उसके बढ़ते रसूख के चलते वर्ष 2000 में विभिन्न दलों के नेता भी उसके बेटे की शादी में पहुंचे।

वर्ष 2005 में ददुआ का बेटा वीर सिंह चित्रकूट का निर्विरोध जिपं अध्यक्ष बना। इसका जश्न ददुआ के गांव देवकली में मना। वर्ष 2007 में ददुआ के भाई बालकुमार ने प्रतापगढ़ की पट्टी विधानसभा क्षेत्र से विधायक का चुनाव  लड़ा पर महज चार सौ मतों से से हार गए। इसके बाद बाल कुमार ने मिर्जापुर से 2009 में सांसदी का चुनाव जीता। वर्ष 2012 में ददुआ के बेटे वीर सिंह ने चित्रकूट व भतीजे राम सिंह ने पट्टी प्रतापगढ़ से विधायकी जीती। इन दिनों यह परिवार सपा नेताओं का करीबी माना जाता है। वर्ष 22 जुलाई 2007 को ददुआ तो पुलिस मुठभेड़ में मारा गया, पर उसका तिलिस्म अब भी कायम है। कहते हैं कि इसी तिलिस्म को भुनाने के लिए मूर्ति स्थापना का प्रयोग किया गया।

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