देश के 73 शहरों में हुए स्वच्छता सर्वेक्षण की ताजा रिपोर्ट में वाराणसी नीचे से नौवें (यानी 65वें) स्थान पर आया। मतलब यह कि वहां के प्रशासन में वाराणसी को स्वच्छ बनाने की ऐसी उत्कंठा नहीं जगी, जिससे यह शहर देश के लिए अनुकरणीय बनता। यह नतीजा बताता है कि शहरों को स्वच्छ बनाना कितनी बड़ी चुनौती है। सफाई के इंतजाम करना और लोगों की आदत बदलना इस मकसद के दो खास पहलू हैं। खासकर उन शहरों में, जो इन दोनों कसौटियों पर पिछड़े रहे हैं।

मैसूर फिर सूची में सबसे ऊपर आया। इसे स्वच्छता की प्रतिस्पर्धा के प्रति दूसरे शहरों की अरुचि के रूप में भी देखा जा सकता है। अगर स्वच्छ भारत मिशन को सफल होना है, तो नगर निकायों के साथ-साथ शहर-निवासियों को भी ऐसी मानसिकता से निकलना होगा। इस बार सर्वेक्षण 10 लाख से अधिक आबादी वाले नगरों में कराया गया। ठोस एवं तरल कूड़ा-कचरा प्रबंधन, सीवर शोधन, बरसाती पानी की निकासी और अन्य कई मानकों के आधार पर रिपोर्ट तैयार की गई। यह एलान पहले ही हो चुका है कि ऊंची रैंकिंग पाने वाले शहरों को अतिरिक्त बजट मिलेगा।

सर्वेक्षण में शहरी स्थानीय निकायों के कामकाज का भी आकलन किया गया। केंद्रीय शहरी विकास मंत्री एम. वेंकैया नायडू ने सूची जारी की तो झारखंड का धनबाद सबसे निचले (73वें) स्थान पर आया। आसनसोल, इटानगर, पटना, मेरठ, रायपुर, गाजियाबाद, जमशेदपुर, वाराणसी, कल्याण-डोंबिवली उसके ठीक ऊपर रहे। अब मुद्दा यह है कि इस रिपोर्ट से इन शहरों के लोग क्या सबक लेंगे?

दरअसल, जिन शहरों ने पिछले साल की तुलना में प्रगति नहीं की, उन सबके निवासियों को इसे एक चुनौती के रूप में लेना चाहिए। प्रधानमंत्री ने स्वच्छ भारत मिशन की शुरुआत करते समय महात्मा गांधी की 150वीं जयंती (2 अक्टूबर 2019) तक भारत को साफ-सुथरा देश बनाने का लक्ष्य घोषित किया था। उन्होंने कहा था कि सवा अरब भारतीय संकल्प कर लें, तो भारत को स्वच्छ होने से कोई नहीं रोक सकता।

यह बात हर शहर के लिए अलग-अलग भी लागू होती है। नगर प्रशासन और नगरवासी संकल्प कर लें, तो अपने शहर के साथ-साथ पूरे भारत को गौरवान्वित करने में वे महत्वपूर्ण योगदान करेंगे। मैसूर के साथ चंडीगढ़, तिरुचिरापल्ली, नई दिल्ली, विशाखापत्तनम, सूरत, राजकोट, गंगटोक, पिंपरी-चिंचवाड़ और ग्रेटर मुंबई ने फिलहाल शीर्ष दस स्थान हासिल कर ऐसा ही योगदान किया है।

पिछले साल सर्वेक्षण एक लाख से अधिक आबादी वाले 476 शहरों में कराया गया था। तब मध्य प्रदेश का दमोह सबसे निचले (476वें) पायदान पर आया था। उल्लेखनीय है कि इन अपेक्षाकृत छोटे शहरों के सामने भी वही चुनौतियां हैं, जो बड़े नगरों के सामने हैं। भारत स्वच्छ तभी होगा, जब हमारे महानगर, शहर, कस्बे और गांव चमकते नजर आएंगे। इस लिहाज से ताजा रिपोर्ट पूरे देश के लिए एक आईना है, तो कुछ कर दिखाने के लिए एक उत्प्रेरक भी।

 

LEAVE A REPLY