माघ शुक्ल एकादशी को आती है ‘जया एकादशी’। इस वर्ष जया एकादशी का व्रत 18 फरवरी यानी गुरुवार के दिन है। मान्यता है कि यदि कोई भी व्यक्ति इस व्रत को करे तो उसे पिशाच योनि में कभी नहीं जाना पड़ता है। वो गंधर्व बनता है। साथ ही अंत में वो स्वर्गलोक जाता है।

हिंदू पौराणिक ग्रंथों में उल्लेखित कथा के अनुसार, प्रचीन समय की बात है। नंदन वन में उत्सव चल रहा था। इस उत्सव में सभी देवता, सिद्ध संत आए हुए थे। गंधर्व गायन तो अप्सराएं नृत्य कर कार्यक्रम का आकर्षक बना रहे थे। ऐसी ही एक सभा में माल्यवान नाम के गंधर्व और पुष्पवती नाम की गंधर्व कन्या का नृत्य आयोजन जारी था।

नृत्य जारी था। तभी अचानक पुष्पवती की नजर माल्यवान पर पड़ी और वो मोहित हो गई। सभा की मर्यादा का मान न रखते हुए वह अमार्यादित नृत्य करने लगे, और सुर-ताल से भटक गए। इंद्र को यह सब कुछ ठीक नहीं लगा। और उन्होंने क्रोध में दोनों को शाप दिय दिया की उन दोनों को पिशाच योनि में जन्म लेना होगा।

अब वह दोनों हिमालय पर्वत पर एक वृक्ष पर रहने लगे। जब उन्हें माघ शुक्ल एकादशी व्रत के बारे में पता चला तो उन्होंने यह व्रत किया। और उन्हें पिशाच योनि से मुक्ति मिली। और वह पुनः स्वर्गलोक चले गए। इंद्र ने जब उन दोनों को स्वर्ग में देखा तो माल्यवान और पुष्पवती ने जया एकादशी की महिमा के बारे में बताया।

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ऐसे करें पूजा : जो जातक जया एकादशी का व्रत रखते हैं उन्हें दशमी तिथि से को एक समय आहार करना चाहिए। इस बात का ध्यान रखें कि आहार सात्विक हो। एकादशी के दिन श्री विष्णु का ध्यान करके संकल्प करें और फिर धूप, दीप, चंदन, फल, तिल, एवं पंचामृत से विष्णु की पूजा करना चाहिए।

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