केंद्रीय गृह मंत्री राजनाथ सिंह ने कहा कि नई दिल्ली के जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय (जेएनयू) में भारत विरोधी नारेबाजी से जुड़े घटनाक्रम को लश्कर-ए-तैयबा के संस्थापक हाफिज सईद का समर्थन प्राप्त है। गृह मंत्री ने यह वक्तव्य उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर ही दिया होगा। इस जानकारी के मद्देनजर उपरोक्त घटना की गंभीरता कहीं ज्यादा बढ़ जाती है। उपरोक्त नारेबाजी के सिलसिले में जेएनयू छात्र संघ के अध्यक्ष कन्हैया कुमार को गिरफ्तार किया जा चुका है। उन पर देशद्रोह का इल्जाम लगा है। कुछ अन्य छात्रों के भी हिरासत में लिए जाने की चर्चा है।

जेएनयू में भारत विरोधी नारेबाजी संसद पर हमले के दोषी अफजल गुरु की फांसी की बरसी पर हुए कार्यक्रम के दौरान हुई। अफजल की तीसरी बरसी पर कार्यक्रम कुछ छात्रों ने आयोजित किया। बताया गया कि वे एक धुर वामपंथी छात्र संगठन से जुड़े थे। कार्यक्रम को ‘द कंट्री विदाउट ए पोस्ट ऑफिस” का नाम दिया गया था। उसके लिए लगे पोस्टर पर लिखा था, ‘लोकतांत्रिक अधिकार-आत्मनिर्णय के लिए कश्मीरियों के संघर्ष के साथ एकजुटता में।” यह भी लिखा था – ‘अफजल और मकबूल की न्यायिक हत्या के खिलाफ।”

कन्हैया और जेएनयू छात्र संघ के दूसरे पदाधिकारी मौके पर मौजूद थे। संभवत: वे खुद नारेबाजी में शामिल नहीं थे। मगर उन्होंने उसे रोकने की कोशिश भी नहीं की। बाद में जरूर छात्र संघ के नेताओं ने उन नारों से खुद को अलग किया। कहा कि भारतीय राष्ट्र और संविधान में उनकी आस्था है। कन्हैया ने सफाई दी कि वामपंथी छात्र संगठन अभिव्यक्ति की आजादी और लोकतांत्रिक तरीके से विरोध जताने के अधिकार को छीनने के खिलाफ हैं, इसलिए उन्होंने प्रोग्राम का समर्थन किया।

किंतु यहां पर आकर यह सवाल जरूर खड़ा होता है कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की सीमा आखिर क्या है? अफजल और जम्मू-कश्मीर लिबरेशन फ्रंट के सह-संस्थापक मकबूल बट्ट को फांसी भारत की न्यायिक प्रक्रिया के तहत हुई। लोकतंत्र में न्यायिक फैसलों से असहमति रखने का हक जरूर होता है, लेकिन उस फैसले का उल्लंघन लोकतांत्रिक अधिकार के दायरे का उल्लंघन माना जाता है। मकबूल बट्ट कश्मीर को भारत से अलग करना चाहता था।

दरअसल, कश्मीर के संदर्भ में आत्मनिर्णय के अधिकार की वकालत का सीधा अर्थ पाकिस्तान संचालित वहां के अलगाववादी आंदोलन का समर्थन ही होता है। क्या कोई देश किसी गुट को खुलेआम अपनी अखंडता को चुनौती देने की इजाजत दे सकता है? जेएनयू में हुई नारेबाजी से भारतीय जनमानस आहत हुआ है। दरअसल, राष्ट्रीय अखंडता को चुनौती देकर उन छात्रों ने अपने खिलाफ वैधानिक कार्रवाई को खुद आमंत्रित किया। इसके बाद मुद्दा नारेबाजी करने वाले छात्रों की पहचान का बचता है।

यह ठीक बात है कि उनकी गलती की सजा ऐसे छात्रों को नहीं दी जानी चाहिए, जिनकी नारेबाजी में भूमिका नहीं थी। इसीलिए असली सवाल दोषियों की पहचान का है। जरूरत घटना की निष्पक्ष जांच की है, ताकि वास्तविक दोषियों को दंडित किया जा सके।

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