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संपादकीय : बैंकों के डूबते कर्ज का मर्ज 




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जिस वक्त बैंकों का डूबा कर्ज भारत की वित्तीय व्यवस्था के लिए बहुत बड़ी समस्या बन गया है, यह जानना बेहद अहम है कि कर्ज नहीं लौटाने वाले आखिर कौन हैं? इस सिलसिले में यह याद करना प्रासंगिक होगा कि चार साल पहले जब बैंकों के डूबते कर्ज की तरफ पहली बार ध्यान गया, तब दो सार्वजनिक बैंकों ने कर्ज भुगतान न करने वालों को शर्मिंदा करने का अभियान चलाया था। इसके लिए डिफॉल्टर्स के फोटो के साथ अखबारों में इश्तहार दिए गए।

लेकिन वे तमाम विज्ञापन छोटे कर्जदारों से संबंधित थे। उन लोगों या कंपनियों की चर्चा नहीं हुई, जिनके कर्ज नहीं लौटाने से बैंकों का मुनाफा गिरा है। इस हफ्ते के आरंभ में इसी कारण स्टॉक एक्सचेंज में राष्ट्रीयकृत बैंकों के शेयरों के भाव तेजी से गिरे। मगर बैंक उन बड़े नामों को बताने से हिचकते रहे हैं। इसीलिए यह मामला जनहित याचिका के जरिए सर्वोच्च न्यायालय के पास गया।

अब सुप्रीम कोर्ट ने भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) से उन कंपनियों की सूची पेश करने को कहा है, जिन पर 500 करोड़ रुपए से अधिक का बैंक कर्ज बकाया है। कोर्ट ने आरबीआई से छह सप्ताह के भीतर ऐसी कंपनियों की लिस्ट भी देने को कहा है, जिनके कर्ज वापसी की समयसारणी को दोबारा तय किया गया। प्रधान न्यायाधीश टीएस ठाकुर की अध्यक्षता वाली खंडपीठ ने पूछा कि बैंक और अन्य वित्तीय संस्थानों ने उचित दिशा-निर्देशों का पालन किए बिना इतनी बड़ी राशि कर्ज में कैसे दी? और क्या इस रकम को वसूलने की उचित प्रणाली मौजूद है?

याचिकाकर्ता की तरफ से अदालत का ध्यान इस तरफ खींचा गया कि कंपनियों को दिया गया करीब 40,000 करोड़ रुपए का ऋ ण 2015 में बट्टे खाते में डाल दिया गया। यह सुनने के बाद पीठ ने कहा कि कर्जों की वसूली न हो पाने के कारण ही सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों की हालत बिगड़ रही है। खंडपीठ ने हैरत जताई कि कर्ज न लौटाने वालों से वसूली के कोई ठोस कदम नहीं उठाए गए हैं। कॉपोरेट जगत की दलील है कि कंपनियों ने कर्ज लेकर जो निवेश किया, वह अर्थव्यवस्था की बदहाली के कारण अलाभकारी हो गया।

विचित्र यह है कि बैंक आसानी से ऐसी दलीलों को स्वीकार कर लेते हैं। नतीजतन, पिछले दिसंबर में (आरबीआई की फाइनेंशियल स्टैबिलिटी रिपोर्ट के मुताबिक) बैंकों का 4,43,691 करोड़ रुपए का कर्ज डूबने के कगार पर था। इसमें तकरीबन 70 फीसदी हिस्सा कंपनियों को दिए गए कर्ज का था। हालांकि आरबीआई के गवर्नर रघुराम राजन ने बार-बार इस समस्या की तरफ ध्यान खींचा है, फिर भी कॉरपोरेट सेक्टर के बड़े कर्जदारों से कर्ज वसूली के कारगर कदम नहीं उठाए गए हैं।

बहरहाल, उम्मीद बंधी है कि अब बड़ी मछलियां भी बेनकाब होंगी। आशा की जानी चाहिए सुप्रीम कोर्ट के हस्तक्षेप से सार्वजनिक धन को न लौटाने वाले कर्जदारों के साथ-साथ बैंक अधिकारियों को भी जवाबदेह बनाने का कोई सिस्टम बनेगा, ताकि आगे कर्ज डूबने की समस्या पर रोक लग सके।

 

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