सुप्रीम कोर्ट ने अरुणाचल प्रदेश में यथास्थिति बनाए रखने का अपना आदेश वापस ले लिया है। नतीजतन इस राज्य में भारतीय जनता पार्टी के समर्थन से कांग्रेस के बागी विधायकों की सरकार बनने का रास्ता साफ हो गया है। इससे लगभग दो महीने पहले अरुणाचल में शुरू हुआ राजनीतिक संकट भाजपा के मन-मुताबिक अपने अंजाम तक पहुंचेगा।

केंद्र सरकार को इससे इसलिए भी राहत मिलेगी, क्योंकि अब बजट सत्र में अरुणाचल में लगाए गए राष्ट्रपति शासन को संसद की मंजूरी दिलाने की चिंता से वह मुक्त हो जाएगी। राज्यसभा में सत्ताधारी एनडीए का बहुमत नहीं होने के कारण संभव था कि राष्ट्रपति शासन का प्रस्ताव वहां गिर जाता। इससे केंद्र के लिए असहज स्थिति पैदा होती।

अरुणाचल में नई सरकार बनाने की सुगबुगाहट पिछले हफ्ते शुरू हुई। बीते सोमवार को कोलिखो पुल के नेतृत्व में कांग्रेस के बागी विधायकों ने राज्यपाल से मुलाकात की। उनके साथ भाजपा के 11 और दो निर्दलीय विधायक भी थे। कोलिखो पुल ने सरकार बनाने का दावा पेश किया। इसके बाद केंद्रीय मंत्रिमंडल ने राष्ट्रपति शासन खत्म करने की सिफारिश राष्ट्रपति के पास भेजी। इसी के मद्देनजर कांग्रेस ने सुप्रीम कोर्ट से यथास्थिति बनाए रखने की गुजारिश की। मंगलवार को कोर्ट ने ऐसा आदेश जारी किया। इससे भाजपा की योजना खटाई में पड़ती दिखी।

लेकिन बुधवार को कोर्ट ने यह आदेश वापस ले लिया। 14 कांग्रेस विधायकों की सदस्यता खारिज करने के विधानसभा अध्यक्ष के फैसले पर स्टे लगाने संबंधी गुवाहाटी हाई कोर्ट के फैसले से संतुष्ट होने के बाद कोर्ट ने यह निर्णय किया। मगर न्यायमूर्ति जेएस खेहर की अध्यक्षता वाली संविधान पीठ ने इस मामले को गुवाहाटी हाई कोर्ट के एक जज की बेंच से खंडपीठ के पास भेज दिया है। खंडपीठ से दो हफ्तों के अंदर फैसला देने को कहा गया है। यानी तब तक नई बनने वाली सरकार के सिर पर तलवार लटकती रहेगी।

अरुणाचल प्रदेश में संवैधानिक संकट की शुरुआत बीते साल हुई, जब 60 सदस्यों वाली विधानसभा में कांग्रेस के 47 विधायकों में से 21 विधायकों ने मुख्यमंत्री नबम तुकी के खिलाफ बगावत कर दी। इसी उथल-पुथल के बीच पिछले 26 जनवरी को राज्य में राष्ट्रपति शासन लागू किया गया था। उसके पहले पिछले 15 दिसंबर को तत्कालीन स्पीकर नबम रेबिया ने 14 विधायकों की सदस्यता रद्द कर दी थी। बागियों ने इस फैसले को हाई कोर्ट में चुनौती दी। तब हाई कोर्ट ने स्पीकर के निर्णय पर स्टे लगाया।

कांग्रेस का दावा था कि 14 विधायकों की अयोग्यता और दो के इस्तीफे के बाद विधानसभा की संख्या अब सिर्फ 44 ही रह गई है। इस हिसाब से तुकी बहुमत में हैं। मगर इस मुद्दे पर सुप्रीम कोर्ट का फैसला फिलहाल उसके खिलाफ गया है। संविधान पीठ इस मामले में स्पीकर और राज्यपाल के अधिकार क्षेत्रों पर विचार कर रही है। उसका फैसला दूरगामी महत्व का होगा। फिलहाल, सुप्रीम कोर्ट के निर्णय से केंद्र को राहत मिली है, जबकि कांग्रेस को तगड़ा झटका लगा है।

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