फिल्म का एक हैरान कर देने वाला सीन। कुछ आतंकियों ने एक प्लेन हाईजैक कर लिया है। डर और आतंक के इस माहौल में इनमें से एक आतंकी केबिन क्रू स्टाफ की एक एयर होस्टेस नीरजा से कहता है कि वो राजेश खन्ना की फिल्म का एक गाना सुनाए। वो गुस्से में आतंकी को देखती रहती है। नीरजा गाना नहीं गाती। आतंकी एक बच्चे के सीने पर पिस्तौल तान देता है। विवश हो कर बहती आंखों से नीरजा गाना गाने लगती है। मेरे सपनों की रानी कब आएगी तू.. आप सोच रहे होंगे कि ऐसे माहौल में कोई किसी फिल्म का गीत कैसे गा सकता है? क्या ये कोई मजाक है? क्या आतंकी किसी जश्न के मूड में थे? ऐसा कतई नहीं है। दरअसल, गुस्से से झल्लाया हुआ वो आतंकी प्लेन हाईजैक के अपने प्लान को विफल होता देख हताश हो चुका था। और उसकी इस हताशा का कारण थी, नीरजा।

नीरजा भनोट, भारत की वो बहादुर एयर होस्टेस, जिसने 5 सितंबर 1986 को अपनी जान की बाजी लगाकर पैन एम फ्लाइट 73 के 359 यात्रियों की जान बचाई थी। इस घटना के दो दिन बाद नीरजा का जन्मदिन था और वो घर से अपनी मां रमा से यह कहकर निकली थी कि उसे उपहार में पीले रंग का सूट चाहिए। नीरजा को ये उपहार मिला तो, लेकिन उस ताबूत के साथ, जो कराची से हिन्दुस्तान आया था। नीरजा की बहादुरी की दास्तां यहीं खत्म नहीं होती। उस हाईजैकिंग में और भी बहुत कुछ हुआ था।

निर्माता के रूप में प्रसिद्ध फैशन फोटोग्राफर अतुल कसबेकर के सराहनीय प्रयास और लंबे समय से विज्ञापन फिल्मों के निर्माण में सक्रिय निर्देशक राम माधवानी के कुशल निर्देशन की बदौतल फिल्म के रूप में ‘नीरजा’ पल-पल चौंकाती है, इमोशनल करती है और कई जगहों पर सन्न भी। फिल्म में नीरजा के किरदार को अदा किया है सोनम कपूर ने, जिसे देख कहा जा सकता है कि ये उनके करियर की सर्वश्रेष्ठ फिल्म है।

फिल्म की कहानी कुछ इस तरह है। पैन एम फ्लाईट 73 कराची के लिए रवाना होने वाली है। एयरपोर्ट पर तमाम तैयारियों को अंतिम रूप दिया जा रहा है। आधी रात बीत चुकी है और नीरजा (सोनम कपूर) बस अपने घर से निकलने ही वाली है। नीरजा एक एयर होस्टेस है और पार्ट टाइम मॉडल भी। टीवी पर जब उसका विज्ञापन आता है तो उसके दो भाई उसका मजाक बनाते हैं। नीरजा तलाकशुदा युवती है और अब मन ही मन एक युवक जयदीप (शेखर रवजिआनी) को चाहती है। जयदीप भी उसे पसंद करता है। वो फ्लाईट पर आती है। रूटीन कार्य पूरे करती है और कुछ देर बाद पैन एम की यह फ्लाईट कराची में उतर जाती है।

यहां थोड़ी देर रुककर विमान को आगे फ्रैंकफट्र के लिए जाना है। विमान से यात्री उतरने की तैयारी कर ही रहे होते हैं कि कुछ आतंकी हमला बोल देते हैं और विमान का अपहरण कर लेते हैं। नीरजा पहले तल पर बने कॉकपिट में बैठे विमान चालक को विमान अपहरण की सूचना दे देती है। चालक दल भाग जाता है, जिससे आंतकियों के मंसूबों पर पानी फिर जाता है। चालक दल को वापस पाने के लिए आतंकी यात्रियों और विमान के स्टाफ के साथ क्रूर व्यवहार करते हैं। नीरजा उन्हें समझाने का प्रयास करती है। वह यात्रियों की मदद करती है। घंटों बीत जाते हैं। आंतकी एक-दो लोगों को और मार देते हैं।

पाक सेना विमान पर हमला बोल देती है और मौका पाकर नीरजा विमान का गेट खोलकर यात्रियों को वहां से निकाल देती है। नीरजा का किरदार प्रेरणादायक है। ऐसी सूरत में जब उसकी मां रमा (शबाना आजमी) उसे बार-बार कहती है कि वो ये नौकरी छोड़ दे। रमा, नीरजा से कहती है कि संकट की घड़ी में पहले अपनी जान बचाए लेकिन नीरजा ऐसा नहीं करती। इन बातों को राम माधवानी ने यर्थाथवादी रूप दिया है और बॉलीवुड के रूटीन ड्रामे से दूर रखा है। उन्होंने ये भी ध्यान रखा है कि कहीं ये डॉक्यूमेंट्री न बन जाए।

उन्होंने फिल्म में सेट-सज्जा, माहौल और शिल्प को भी बिगड़ने नहीं दिया है। अस्सी के मध्य के दशक में जिंदगी कैसी होगी? ब्लैक एंड व्हाइट टीवी, पहनावा, बोल-चाल आदि पर उनकी पकड़ है। ये बातें निर्देशक की गंभीरता को दर्शाती हैं। नीरजा के किरदार को बखूबी लिखा गया है। तलाक से पहले शादीशुदा जिंदगी का तनाव, घर लौट आना, पिता की सीख, हाईजैक के बाद घर का माहौल और सबसे बड़ी बात रमा का बर्ताव।

फिल्म में नीरजा के बाद सबसे मजबूत किरदार रमा का है। रमा की बेटी संकट में है। किसी को पता नहीं कि कराची में क्या हो रहा है, ऐसे समय में रमा की सामान्य रहने की कोशिश विचलित कर देती है। अगर आप एक अच्छी फिल्म देखना चाहते हैं तो नीरजा आपका इंतजार कर रही है। हां, फिल्म में एक दो बातें अटपटी भी हैं, लेकिन अब यहां उनका जिक्र करना बेमानी है, क्योंकि नीरजा मरने से पहले मरकर जीना चाहती थी।

कलाकार: सोनम कपूर, शबाना आजमी, शेखर रवजिआनी, योगेन्द्र टिकुनिर्देशक: राम माधवानी, निर्माता: अतुल कसबेकर, शांति शिवराम मैनीसंगीत: विशाल खुराना, गीत: प्रसून जोशी पटकथा: साइवेन कादरस

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