चांद के चारों तरफ बना घेरा (वलय) शुक्रवार की रात पटना और आसपास के इलाके के लोगों के लिए कौतुहल का विषय बना रहा। घेरा ऐसा लग रहा था जैसे बादल और धुंध की पतली लकीर चांद के चारों ओर बन गई थी। चांद के साथ ही वह भी घूमता प्रतीत हो रहा था। इसे देखते ही लोग अपने दोस्तों और रिश्तेदारों को फोन करने लगे। कई लोगों ने अखबार के दफ्तरों में फोन कर इस बारे में पूछा। कुछ लोग इसे आने वाले खराब समय का सूचक मान रहे थे तो कुछ के अनुसार यह ग्लोबल वार्मिंग का असर है।

‘हैलो ऑफ मून’ नई बात नहीं: मौसम विज्ञान केंद्र के निदेशक एके सेन ने बताया कि यह कोई नई बात नहीं है। सितम्बर-अक्टूबर और फरवरी-मार्च के महीने में अमूमन ऐसा देखा जाता है। इस समय चांद के चारों तरफ गोल घेरा बन जाता है, जिसे ‘हैलो ऑफ मून’ कहते हैं।
दरअसल आकाश में बादलों में आइस क्रिस्टल होते हैं जो कई बार चांद की रोशनी से टकराते हैं। इससे रोशनी प्रतिबिम्बित होती है और इस तरह का घेरा बनता हुआ दिखता है।

सामान्य खगोलीय परिघटना: मौसम विज्ञानी एके सेन के अनुसार यह एक सामान्य खगोलीय परिघटना है और इसको लेकर डरने की जरूरत नहीं है। इसे कुछ लोग मून रिंग या विंटर हैलो के अलावा निम्बस या आइसबो भी कहते हैं। कई बार यह सूर्य के भी चारों तरफ घेरा बनता है और ऐसी स्थिति में इसे सोलर हैलो कहते हैं। तारामंडल के निदेशक जयप्रकाश सिंह ने कहा कि वह इस मामले के विशेषज्ञ नहीं हैं, लिहाजा कुछ नहीं बता सकते हैं।

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