एक वरिष्ठ सरकारी अधिकारी ने कहा कि भारतीय वैज्ञानिकों को वर्ष 1950 के दशक में जीका विषाणु की जानकारी थी और उन्होंने तब वैश्विक स्वास्थ्य खतरे के रूप में उभरे विषाणु को शीशी में रखा था।

भारतीय चिकित्सा अनुसंधान परिषद (आईसीएमआर) की महानिदेशक सौम्या स्वामीनाथन ने संवाददाताओं से कहा कि हमारे पास वह रिपोर्ट है और उन्होंने (भारतीय वैज्ञानिक) उस समय उस विषाणु को शीशी में भी संरक्षित किया था।

उन्होंने कहा कि इसे पुनर्जीवित नहीं किया जा सका क्योंकि उन दिनों हमें नहीं पता कि उन्होंने इसे कैसे रखा था। वर्ष 1951 या 52 में भी वैज्ञानिकों ने इसे रखने के बारे में सोचा।

इसके अलावा, स्वामीनाथन ने कहा कि भारत बायोटेक के पास टीका विकसित करने के दो प्रस्ताव हैं। एक निष्क्रिय किये गये जीका विषाणु से और दूसरा रिकंबिनेंट से एक प्रस्ताव है। उन्होंने कुछ शुरूआती काम किया है। अगले कुछ महीनों में हम करीबी रूप से नजर रखकर उसके साथ काम करेंगे और प्रगति देखेंगे।

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