download (1) download (2)

(मानवेन्द्र मिश्रा)

गोपालगंज : यूं तो बिहार में कई प्रसिद्ध देवी मंदिर हैं, लेकिन गोपालगंज जिले में स्थित थावे भवानी मंदिर को जाग्रत शक्ति पीठ माना जाता है। भक्त थावे मंदिर में आकर सिंहासिनी भवानी मां के दरबार का दर्शन कर उनका आशीर्वाद लेकर खुद को धन्य समझते हैं। मान्यता है कि दयालु मां यहां आने वाले श्रद्धालुओं के सभी मनोरथ पूरी करती हैं।

गोपालगंज जिला मुख्यालय से करीब छह किलोमीटर दूर सीवान जाने वाले मार्ग पर थावे नाम का एक स्थान है, जहां मां थावेवाली मां एक प्राचीन मंदिर है। मां थावे वाली को सिंहासिनी भवानी, थावे भवानी और रहशु भवानी के नाम से भी जाना जाता है। ऐसे तो मां के भक्त यहां सालों भर आते हैं, परंतु शारदीय नवरात्र और चैत्र नवरात्र के समय यहां श्रद्धालुओं की भारी भीड़ लगती है।मान्यता है कि यहां मां अपने भक्त रहशु के बुलावे पर असम के कामाख्या से चलकर यहां पहुंची थीं। कहा जाता है कि देवी मां कामाख्या से चलकर कलकत्ता (कोलकाता) के दक्षिणेश्वर में काली के रूप में प्रतिष्ठित हुईं, पटना में पटन देवी के नाम से जानी गईं। आमी (छपरा जिले में मां दुर्गा का एक प्रसिद्ध स्थान) होते हुए थावे पहुंची थीं और रहशु के मस्तक को विभाजित करते हुए भक्तों को साक्षात दर्शन दिए थे।देश के 52 शक्तिपीठों में से एक इस मंदिर के पीछे एक प्राचीन कहानी है। जनश्रुतियों के मुताबिक, राजा मनन सिंह हथुआ के राजा थे। वे अपने आपको मां दुर्गा का सबसे बड़ा भक्त मानते थे। गर्व होने के कारण अपने सामने वे किसी को भी मां का भक्त नहीं मानते थे। इसी क्रम में राज्य में अकाल पड़ गया और लोग खाने को तरसने लगे। थावे में कामाख्या देवी मां का एक सच्चा भक्त रहशु रहता था। कथा के अनुसार, रहशु मां की कृपा से दिन में घास काटता और रात में उसी से अन्न निकल आता था। वहां के लोगों को अनायास अन्न मिलने लगा। राजा को मगर विश्वास नहीं हुआ।राजा ने रहशु को ढोंगी बताते हुए मां को बुलाने के लिए कहा और ऐसा न करने पर सजा देने की बात कही। रहशु ने कई बार राजा से प्रार्थना की कि अगर मां यहां आएंगी तो राज्य बर्बाद हो जाएगा, परंतु राजा नहीं माने। रहशु की प्रार्थना पर मां कोलकाता, पटना और आमी होते हुए यहां पहुंचीं। उसी समय राजा के सभी भवन गिर गए और राजा की मौत हो गई।

 

LEAVE A REPLY