अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस के मौके पर नई दिल्ली में आयोजित महिला सांसदों और विधायकों के दो-दिवसीय राष्ट्रीय सम्मेलन ने सभी राजनीतिक दलों को याद दिलाया कि महिलाओं से किया गया उनका एक महत्वपूर्ण वादा कोरा पड़ा हुआ है। विधायिका में महिलाओं को 33 फीसदी आरक्षण देने के लिए विधेयक आए दो दशक गुजर गए, लेकिन उसके पारित होने की निकट भविष्य में भी कोई संभावना नजर नहीं आती।

संभवत: इसी कारण सम्मेलन में दिए अपने उद्घाटन भाषण में राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी ने कहा कि सियासी पार्टियां केवल बातें ही ना करें, बल्कि प्रतिबद्धता दिखाते हुए यह विधेयक पारित कराने के लिए आगे आएं। उपराष्ट्रपति हामिद अंसारी ने कहा कि जब तक यह कानून बन नहीं जाता, राजनीतिक दलों को चुनावों के समय महिलाओं को ज्यादा टिकट देने की पहल स्वेच्छा से करनी चाहिए।

क्या देश के दो सर्वोच्च पदाधिकारियों की ये बातें सुनी जाएंगी? ऐसा हो, तो आधी आबादी को सियासत में आधा हिस्सा देने की तरफ भारत भी आगे बढ़ता दिखेगा। वरना, फिलहाल तस्वीर निराशानजक है। अभी वैश्विक अनुपात की तुलना में भारत में महिला जनप्रतिनिधियों की संख्या काफी कम है। 16वीं लोकसभा में 66 महिला सांसद जीतकर आईं, जो कुल सदस्य संख्या (543) का 12.15 प्रतिशत है। 1952 में गठित पहली लोकसभा में सिर्फ 4.4 फीसदी (489 में 22) महिला सांसद थीं।

उससे तुलना करें तो संतोष हो सकता है, लेकिन यह तथ्य इस प्रगति की चमक फीकी कर देता है कि महिला सांसदों का वैश्विक औसत 22 प्रतिशत है। यानी भारत से लगभग दोगुना। प्रत्यक्ष निर्वाचित सदन में महिला प्रतिनिधियों की उपस्थिति के लिहाज से तैयार 190 देशों की तैयार सूची में पिछले वर्ष भारत 103वें स्थान पर था। महिला विधायकों की कुल संख्या तो महज लगभग 9 फीसदी बैठती है।

क्या इस स्थिति पर संतोष किया जा सकता है? दरअसल, चुनाव के समय टिकट वितरण में सभी पार्टियों में महिलाओं से भेदभाव का नजरिया हावी रहता है। एक मिसाल देखना काफी होगा। पिछले लोकसभा चुनाव में कांग्रेस ने सिर्फ 45 और भाजपा ने 30 महिलाओं को टिकट दिया। वैसे अकसर देखा यह भी गया है कि महिलाओं को पार्टियां टिकट उन क्षेत्रों से देती हैं, जहां वे वास्तविक मुकाबले में नहीं होतीं।

तो समझा जा सकता है कि निर्वाचित सदनों में महिलाओं की बेहद कम उपस्थिति की वजह क्या है? यह इसके बावजूद है कि आज पंचायतों एवं स्थानीय निकायों में 12.70 लाख निर्वाचित महिला प्रतिनिधि हैं। उनमें से अनेक ने स्थानीय स्तर पर उत्कृष्ट नेतृत्व का उदाहरण पेश किया है। यानी जहां महिलाओं को मौका मिला, वहां वे किसी से पीछे नहीं रहीं। असल में ऐसा उन्होंने संसद और विधानसभाओं में भी करके दिखाया है।

तो इस महिला दिवस पर सभी पार्टियों को यह ठोस संकल्प लेना चाहिए कि वे यथाशीघ्र महिला आरक्षण विधेयक पारित कराएंगी। ऐसा नहीं हुआ, तो महिलाओं के लिए किए गए उनके तमाम वादे दिखावटी और वोट पाने के जुमले समझे जाएंगे।

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