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माल्या की मुसीबत से लेना होगा सबक 




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सरकार ने पुष्टि कर दी है कि विवादास्पद उद्योगपति विजय माल्या देश छोड़कर जा चुके हैं। इस तरह उनके तुरंत कानून की गिरफ्त में आने की संभावना क्षीण हो गई है। बताया गया है कि वे फिलहाल किसी अज्ञात स्थान पर हैं और अपने कर्मचारियों से भी उनका संपर्क नहीं है। इस बीच सुप्रीम कोर्ट ने सरकारी बैंकों की तरफ से पेश हुए अटॉर्नी जनरल मुकुल रोहतगी की इस मामले की सुनवाई तुरंत शुरू करने की गुजारिश मान ली। मगर माल्या देश नहीं लौटे तो कोर्ट के आदेशों की तामील करना आसान नहीं होगा। दीवानी मामलों में आरोपियों को विदेश से वापस लाना अब तक टेढ़ी खीर रहा है।

17 सरकारी बैंकों को माल्या और उनकी कंपनी किंगफिशर एयरलाइंस से करीब 7,800 करोड़ रुपए वसूलने हैं। किंगफिशर एयरलाइंस तकरीबन तीन साल से बंद पड़ी है। इस कंपनी ने 2012 से ना तो बैंकों का कर्ज चुकाया है, ना ही ब्याज दिया है। केंद्र सरकार का सीरियस फ्रॉड इन्वेस्टिगेशन ऑफिस (एसएफआईओ) इस बात की जांच शुरू कर चुका है कि किंगफिशर ने कर्ज के पैसे का इस्तेमाल कहीं और तो नहीं किया?

वैसे आम समझ है कि किंगफिशर जिस मुसीबत में फंसी, उसका कारण माल्या की फिजूलखर्ची थी। एक तरफ उन्होंने सबसे अलग होने की कोशिश में विमान सेवा संचालन की लागत बढ़ाई, तो दूसरी तरफ अपनी निजी जीवन शैली और महंगे शौक को पूरा करने का बोझ भी अपने कारोबार पर डाला। नतीजतन एक समय अप-मार्केट मानी जाने वाली किंगफिशर एयरलाइन को चलाना कठिन होता गया। अंतत: इसकी सेवाएं रोकनी पड़ीं। इससे सैकड़ों लोगों के रोजगार खतरे में पड़े। बैंकों का कर्ज डूबने की कगार पर पहुंचा।

माल्या पर सबसे ज्यादा कर्ज भारतीय स्टेट बैंक का है। इस बैंक ने पिछले साल उन्हें विलफुल डिफॉल्टर यानी जान-बूझकर कर्ज ना चुकाना वाला घोषित किया था। इसके बाद दो अन्य बैंकों ने भी यही कदम उठाया। माल्या की शराब बनाने वाली कंपनी यूनाइटेड ब्रेवरीज होल्डिंग्स को भी कुछ बैंकों ने विलफुल डिफॉल्टर घोषित किया है। माल्या अगर कारोबार के प्रति लापरवाही नहीं दिखाते, बिजनेस पर अपनी मौज-मस्ती को तरजीह नहीं देते तो शायद यह नौबत नहीं आती।

वैसे सरकारी बैंकों का धन आज डूबने की कगार पर पहुंचा, तो इसमें उनके अधिकारियों का भी दोष है। किंगफिशर को ब्लैकलिस्ट किए जाने के बाद भी माल्या 900 करोड़ रुपए का नया कर्ज लेने में सफल हो गए। क्या ऐसा भ्रष्टाचार के कारण हुआ? इस पहलू की जांच जरूर होनी चाहिए। भारत में बैंकों से कर्ज लेकर ऐय्याशी करने वाले धनी-मानी लोगों की कमी नहीं है। इससे जहां जनता के हजारों करोड़ रुपए डूब गए हैं, वहीं मालिकों की लापरवाही की कीमत उनकी कंपनियों के कर्मचारियों को भी चुकानी पड़ी है।

अब वक्त ऐसे गड़बड़-घोटाले में शामिल तमाम लोगों की जवाबदेही तय करने का है। विजय माल्या के मामले में ऐसी मिसाल कायम होनी चाहिए, जिससे भविष्य में उनकी राह पर चलने की हिम्मत कोई और उद्योगपति ना कर पाए।

 

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