हिमाचल प्रदेश- कालेश्वर में बैसाखी स्नान पर मिलता है पांच तीर्थों का पुण्य
हिमाचल प्रदेश- कालेश्वर में बैसाखी स्नान पर मिलता है पांच तीर्थों का पुण्य

हिमाचल प्रदेश के प्रसिद्ध धार्मिक तीर्थस्थल महाकालेश्वर मंदिर में कालांतर से मनाए जाने वाले बैसाखी मेले के महत्व का सहज ही वर्णन करती हैं। इस वर्ष यह मेला 12 अप्रैल से 14 अप्रैल तक कालेश्वर धाम में पारम्परिक एवं धार्मिक रीति से बड़े हर्षोल्लास के साथ मनाया जा रहा है।  हिमाचल के हरिद्वार के रूप में विख्यात प्राचीन कालीनाथ महोदव का ऐतिहासिक मंदिर देहरा उपमंडल के कालेश्वर में व्यास नदी के तट पर स्थित है। यूं तो इस मंदिर के साथ शांत रूप में बहती व्यास नदी की अविरल धारा में पूर्णिमा, अमावस्या एवं ग्रहण इत्यादि पर लोगों द्वारा स्नान करके पुण्य प्राप्त किया जाता है, परन्तु बैसाख माह की सक्रांति के पावन अवसर पर इस स्थल पर पूजा अर्चना एवं स्नान का विशेष महत्व है, लोगों का विश्वास है कि हरिद्वार एवं अन्य तीर्थ स्थलों की भांति ही इस पवित्र स्थल पर स्नान करने का पुण्य प्राप्त होता है।  कालेश्वर का अर्थ है ‘कालस्य ईश्वर’ अर्थात काल का स्वामी, काल का स्वामी शिव हैै। उज्जैन के महाकाल मंदिर के बाद कालेश्वर मंदिर एकमात्र ऐसा मंदिर है जिसके गर्भ गृह में ज्योर्तिलिंग स्थापित है। यहां भगवान शिव का एक अद्भुत लिंगरूप में विराजमान हैं यहां शिवलिंग जलहरी से नीचे स्थित है। कालेश्वर मंदिर का स्वरूप उज्जैन के महाकाल मंदिर के समान प्रतीत होता है। उज्जैन में शिप्रा नदी तथा कालेश्वर मंदिर के साथ ब्यास नदी बहती है। कालेश्वर में स्थित कालीनाथ मंदिर का इतिहास पांडवों से जुड़ा है। जनश्रुति के अनुसार इस स्थल पर पांडव अज्ञातवास के दौरान आए थे, जिसका प्रमाण ब्यास नदी तट पर उनके द्वार बनाई गई पौड़ियों से मिलता है। बताया जाता है कि पांडव जब यहां आए तो भारत के पांच प्रसिद्ध तीर्थों हरिद्वार, प्रयाग, उज्जैन, नासिक व रामेश्वरम का जल अपने साथ लाए थे और जल को यहां स्थित तालाब में डाल दिया था जिसे ‘पंचतीर्थी’ के नाम से जाना जाता है। तभी से पंचतीर्थी तथा व्यास नदी में स्नान को हरिद्वार स्नान के तुल्य माना गया है। एक अन्य किंवदंती के अनुसार महर्षि व्यास ने यहां घोर तपस्या की थी इसका प्रमाण इस स्थल पर स्थित ऋषि मुनियों की समाधियां से मिलता है। इस मंदिर परिसर में कालीनाथ के अतिरिक्त राधा कृष्ण, रूद्र, पंाच शिवालय सहित नौ मंदिर तथा 20 मूर्तियां अवस्थित हैं।  एक सर्वेक्षण के अनुसार मंदिर 15वीं सदी का बना हुआ है। जिसके अनुसार इस मंदिर का निर्माण पांडवों, कुटलैहड़, एवं जम्मू की महारानी तथा राजा गुलेर ने करवाया था। इस तीर्थ स्थल के साथ महाकाली के विचरण का महात्म्य भी जुड़ा है। ऋग्वेद के अनुसार सतयुग में हिमाचल की शिवालिक पहाड़ियों में दैत्य राज जालंधर का आतंक भरा साम्राज्य था। दैत्य राज के आंतक से निजात पाने के लिए सभी देवता एवं ऋषि मुनियों ने भगवान विष्णु के दरबार में फरियाद की। देवों, ऋषियों, मुनियों ने सार्मथ्यानुसार अपनी शक्तियां प्रदान करने पर विराट शक्ति महाकाली प्रकट हुई। जिनके द्वारा सभी राक्षसों का अंत करने के उपरांत महाकाली का क्रोध शांत करने के लिए भगवान शिव रास्ते में लेट गए और उनके स्पर्श से महाकाली शांत हुई। महाकाली इस गलती का प्रायश्चित करने के लिए वर्षों हिमालय पर विचरती रही और एक दिन इसी स्थान पर व्यास के किनारे भगवान शिव को याद किया। भगवान शिव ने महाकाली को दर्शन दिए और इस पावन स्थली पर महाकाली ने प्रायश्चित किया। उसी समय यहां ज्योर्तिलिंग की स्थापना हुई और इस स्थान पर नाम महाकालेश्वर पड़ गया। यहां पर बैसाखी स्नान को गंगा स्नान के तुल्य माना गया है। इस क्षेत्र के लोग जो हरिद्वार जाने में असमर्थ होते हैं वह यहां अस्थियां भी प्रवाहित करते हैं। प्रदेश सरकार द्वारा इस धार्मिक स्थल पर आयोजित होने वाले बैसाखी मेले के महत्व को मद्देनजर रखते हुए इस मेले को राज्य स्तरीय मेले का स्वरूप दिया गया और इस मेले को आकर्षक बनाने के लिए सांस्कृतिक इत्यादि गतिविधियों को जोड़कर इसे तीन दिवसीय मेले के रूप में मनाया जाने लगा। मेला समिति द्वारा श्रद्धालुओं की सुविधा के लिए व्यापक प्रबंध किए गए हैं, विशेषकर स्नान इत्यादि के लिए बेहतर व्यवस्था की गई है जिसमें महिलाओं के लिए विशेष प्रबंध किए गए हैं।मेले में पेयजल, विद्युत आपूर्ति, पार्किंग भी सभी आवश्यक व्यवस्था की गई है ताकि बाहर से आने वाले श्रद्धालुओं को काई सुविधा न हो। निकट भविष्य में यह स्थल धार्मिक पर्यटन के रूप में उभरेगा। यहां पर व्यास नदी में नौका विहार इत्यादि जल क्रीड़ाओं के विस्तार की अपार संभावनाएं हैं, जिससे इस क्षेत्र में स्वरोजगार के व्यापक अवसर सृजित होंगे। 

 

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