वो सरपट-भागती गाडियाँ, गाडियों के पीछे भागते धूल का उन्माद. चिडियों का धूल-स्नान, कुत्तों की अटखेलियां.
एक आदमी कुछ मिट्टी को अपने झोले में लेकर चल देता और झोले में बैठा धूल भ्रमित होकर इस अबुझ-पहेली को समझने की कोशिश करता है. बाहर उसके संगी-साथी विस्मय की निगाह से अपने स्वछन्द अधिकारों का हनन देखते हैं.

कुछ देर के बाद वो शुरू होता है, जिसकी कल्पना ना झोले की मिट्टी को थी ना उसके सहचरों को…
मिट्टी को रौन्दते हाथ, आघात पर आघात…

हाय, मेरे साथ ऐसा मत करो, मैं पीडा में हुँ. मैंने तुम्हारा क्या बिगाड़ा है, मुझे अपने गंतव्य तक पहुँचा दो…

पर, उस आदमी ने एक ना सुनी और चोट देता गया. सारा कंकड़ हटा दिया और उसको एक घिरनी पर रख इतने जोड़ से नचाया कि लगा जैसे जीवन-लीला खत्म हुई.

एक अलग तरह की शक्ल दे, उस आदमी ने किनारे रख दिया. खुद को निहारता अस्तित्व अपने सहचरों से मिलन की अंतिम आस लिये अशक्त बैठा, उन बच्चों की तरफ़ कातर-दृष्टि लगाये हुए है, जो उसे अपलक निहार रहे हैं.

अरे, मेरे कान को पकड़ के कहाँ ले जा रहे हो भला…
मैं उस आग में नहीं जाऊँगा…कुछ तो तरस खाओ…अपने ही बन्धु-बान्धवों से दूर मुझे क्यों जलाना चाहते हो ? क्या अपराध किया है मैंने ?

आदमी के कठोर हृदय ने आग की भेंट चढाकर खुद को तृप्त-भाव से भर लिया.

जलकर पूरा रंग ही बदल गया. अब तो मुझपर पड़ने वाले थाप एक ध्वनि, एक संगीत की लहरियाँ उत्पन्न करते हैं. जिस पानी की ताकत मुझे कीचड़ का रुप देती थी, उसको भी राग-रहित शीतल-आश्रय दे पाने में समर्थ हुँ.
पहले कोई भोजन अगर गिर जाता था, सब घृणा करते थे. अब तो, मुझ में रख पवित्र होने का प्रमाण देते हैं और अपने ईश को श्रद्धा-सहित समर्पित कर रहे हैं.

ये सब तो मेरा ही है…पर, वो आदमी कहाँ गया, जो मेरी गालियाँ और दुत्कार को चुपचाप सहता गया मेरे निर्माण में…

जमीन के किसी कोने में कुछ धुंधला लिखा छोड़ गया…तुम्हारा रुप ही मेरी पहचान है. तुम्हारे निर्माण में मिले तिरस्कार ही मेरी नियति…

अमरदीप झा गौतम
एलिट इन्स्टिचुट,पटना.b674dfa9-80de-4f28-89b4-bca0405406e1

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