उबला जल ही पीलिया से बचाव का बेहतर उपाय
     इसमें दोराय नहीं है कि जल के बिना जीवन अधूरा है। जल न केवल प्राणियों की प्यास बुझाने के काम आता है, बल्कि जमीन और खेती भी इसके अभाव में दम तोड़ देती है। इसे विडम्बना ही कहा जाएगा कि मानवीय शरीर में 70 प्रतिशत से अधिक पानी होने पर भी हम जल की कदर नहीं करते हैं। हमारी इस लापरवाही के वज़ह से जल दिन-प्रतिदिन दूषित होता जा रहा है। हाल में शिमला में फैला पीलिया हमारी इसी लापरवाही का सबूत है।
विशेषज्ञ बताते है कि रोगाणु, हानिकारक अशुद्धियों तथा आवश्यकता से अधिक मात्रा में मिनरल होने पर जल दूषित हो जाता है और कई बीमारियों की वजह बनता है। ऐसे जल के सेवन से पीलिया, हैजा, अतिसार, बुखार, टाइफाईड आदि बिमारियां शरीर को अपना घर बना देती है।
सिंचाई एवं जन स्वास्थ्य विभाग के प्रवक्त्ता ने बताया कि जनवरी माह से 25 मई, 2016 तक की अवधि में धर्मशाला मंडल व वृत (सर्कल) में पानी के 750 सैंपल जांचे गए हैं, जो सभी ठीक पाए गए हैं।

विशेषज्ञ बताते हैं कि इन तमाम बिमारियों से बचने का बेहतर उपाय है, जल को उबाल कर पीना। विशेषकर पीलिया में तो यह अति आवश्यक हो जाता है क्योंकि फिल्टर एवं आर0ओ0 पीलिया के वायरस को समाप्त करने में प्रभावहीन पाए गए हैं। फिल्टर एवं आर0ओ0 भले ही पानी में तमाम अशुद्धियों को दूर कर देते हैं किंतु पीलिया के वायरस को समाप्त करने में असरहीन रहे हैं।
यह सुनने में विचित्र लगता है किन्तु सत्य है कि मनुष्य जल को लेकर आज भी संवेदनशील नहीं हैं। विशेषज्ञ पेयजल को लेकर तृतीय विश्वयुद्ध की संभावना भी व्यक्त कर चुके हैं परन्तु हम आज भी अपनी आंखों पर बंधी पट्टी को खोलने के लिए तैयार नहीं है। महात्मा गांधी ने कहा है कि प्रकृति में सभी की जरूरतों को पूरा करने के लिए सब कुछ मौजूद है, किंतु एक व्यक्ति के भी लालच को पूरा करने के साधन उसके पास नहीं है।
जिला कांगड़ा के स्वास्थ्य अधिकारी डॉ0 राजेश गुलेरी बताते हैं कि पीलिया रोग तीन प्रकार का होता है जिसमें वायरल, हैपेटाईटिस ए, बी तथा नान-ए और नान-बी शामिल है, जिसे सामान्यता पीलिया के नाम से जाना जाता है। यह बीमारी बहुत ही छोटे वायरस से आरम्भ होती है और शुरू में इसकी गति अत्यंत धीमी होती है और इसके लक्षण भी दिखाई नहीं देते हैं, परन्तु बाद में भयंकर रूप धारण कर लेते हैं। रोगी की आंख तथा नाखून पीले दिखने आरम्भ हो जाते हैं इसलिए लोग इसे पीलिया के नाम से जानते हैं। वह कहते हैं कि व्यक्तिगत स्वच्छता के अतिरिक्त बेहतर होगा कि सामुदायिक स्वच्छता के लिए समाज प्रतिबद्ध रहे। तमाम उपचार विधियों के साथ खान-पान का ध्यान रखा जाए और पानी उबला हुआ ही पिया जाए।

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