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बिकता लोकतंत्र जिम्मेवार हम 




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नवीन कुमार/विचार:- आज देश में चारों तरफ लोकतंत्र को खरीदने वाले खरीदार उभर कर आ रहे है, और हम  शर्म करने की बजाय  गर्व करते है.आप का सवाल होगा  किस की बात कर रहे है? जो लोकतंत्र को खरीदने की हिम्मत कर रहा है, ऐसा तो आप होने ही नहीं देगे ,किसी भी कीमत पर होने नहीं देंगे वगैरह… वगैरह. लेकिन ये कड़वा सच है की हम हमारी सौदेबाज़ी करवाने के लिए लालायित रहते है, जाने अनजाने हम सौदेबाज़ी की गिरफ्त में पूरी तरफ आ चूके है ,सवाल पैदा होता है   कैसे? सबसे पहले बात करते है सरकारी तंत्र के ढाँचे  की  कहने को ये सबसे विश्वसनीय सिस्टम है इस प्रजातंत्र का, लेकिन ये आप भी खूब भलीभांति जानते है कि सबसे ज्यादा बिकाऊ सिस्टम में सरकारी तंत्र भी एक है एक आम नागरिक  सरकारी  परिचय पत्र   बनवाने के लिए कमी के तौर पर  यदि एक कागज नहीं है बनवाने  के लिए देता है  तो सरकारी परिचय पत्र  बिना रिश्वत  के बनवाना असंभव है और हम बनवाने के लिए मिन्नते करते है वो अलग.लेकिन वो ही सरकारी परिचय पत्र रिश्वत देकर बिना सिरदर्दी के बन जाता है अब सोचिये कितनी बड़ी खामी  है सिस्टम में  उसके बावजूद कुछ सुधार नही  क्या सरकार को इसमें खामिया नजर नहीं आती? इस भ्रष्ट सरकारी तंत्र में ये तो एक बानगी भर उदारहण आपको दिया है. मेरे से ज्यादा तो आप अनुभवी वो  तमाम नागरिक  समझते है जो सिस्टम के सताए हुए है, अब आते है कानून व्यवस्था  पर जिसमें सबसे पहले जिम्मेवारी पुलिस की आती है पुलिस काम करती है लेकिन जो जज्बा एक जवान का देश के लिए होता है वो पुलिस का देश के उन नागरिकों के लिए होना चाहिए ,जिसके लिए उन्होंने वर्दी पहनी है लेकिन ऐसा न होकर कानून का दुरूपयोग करवाने में पुलिस भी पीछे नहीं है महज किसी के कहने पर एक आम इंसान को आरोप तय होने से पहले ही इतना टॉर्चर कर दिया जाता है कि आरोप सिद्ध होने की जरुरत ही नहीं पड़ती क्या इसमें सुधार की जरुरत नहीं है कानून की पोल खोल कथा तो बहुत विस्तारपूर्वक  है  जिससे आप भली भांति परिचित है आप बताइये , क्या इसमें सुधार की जरुरत नहीं है ? आइये  अब बात करते है न्यायिक तंत्र की एक इंसान जिसके साथ  बड़ी घटना घट जाती है  ,लूटपाट ,शारीरिक शोषण आदि .. ,उसको अपनी लड़ाई लड़ने के लिए धन के साथ –साथ समय,सुरक्षा की जरूरत भी पड़ती है जिसमे पीड़ित इंसान इतना टूट जाता है कि न्यायायिक व्यवस्था से आस ही टूट जाती है, और हालात से समझौता करने के लिए मजबूर हो जाता है ज्यादा विश्लेषण नहीं करूँगा आप भी भली भांति  परिचित है न्यायायिक सिस्टम से बस इसको दुरुस्त करने की जरुरत है न्यायालय में अधिकतर वकील ये चाहते है कि तारीख लम्बी चले ,पुलिस केस की संख्या ज्यादा हो जिससे उनका व्यापार फले फूले. तारीख लम्बी ना हो केस लम्बा न चले इसके लिए भी समझोता होता है ये बिकता लोकतंत्र नहीं तो क्या है ? अब बात करते है नेताओ की मंत्रियो की इनको नेता मंत्री भी हम ही बनाते है लेकिन इसके जिम्मेवार भी हम है एक  हमारा मत उनको कहाँ  ले जा सकता है इसका हमें अंदाजा तो है और जानते भी है उसके बावजूद  हम उसका  सही उपयोग नहीं करते और हम बिक जाते है धर्म ,जात ,पैसे ,के आधार पर और कर देते है देश का सौदा सोचिये जब हम थोड़े से लालच के चक्कर में देश की नहीं सोचते तो बिकते लोकतंत्र पर खाली अफ़सोस मनाने से क्या होगा? जिम्मेवार रोता बिलकता  लोकतंत्र नहीं जिम्मेवार हम है. एक नजर मीडिया पर भी जिसमें  टी आर पी का वायरस ऐसा घुस गया है की जो सच को सामने नहीं लाने में या सकारात्मक पहलू  को दिखाने में रूचि नहीं दिखाता इस वायरस को मीडिया में लाने वाले भी लोकतंत्र बिकवाने में शामिल है क्योंकि इंसान की फितरत है की सुनने से ज्यादा ताकतवर देखने को माना गया है यही वजह है की जो सच मीडिया सामने लाना भी चाहती है उसे ये टी आर पी वायरस नहीं आने देता,क्यों नहीं मीडिया को वो सब सुविधाये दी जाये , जिससे टी आर पी की मौत कम से कम मीडिया में से हो सके या कहे टी आर पी वायरस से छुटकारा मिल सके अन्यथा ये आगामी वर्षो में मीडिया के लिए घातक सिद्ध होगा और मीडिया  लोगो का तमाशा बनाने के सिवाय कुछ नहीं कर पाएगी वर्तमान  में मीडिया अधिकतर  मसालेदार खबरों को ही बढ़ा चढ़ा कर दिखाती है जिससे पत्रकारिता एक शुद्ध व्यवसाय बन गया है जिसे कही से भी उचित नहीं ठहराया जा सकता है   .

 

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