img-20161026-wa0010बच्चों के नाम का मुर्गा पालते हैं माडिय़ा जनजाति के लोग

इक्कीसवीं सदी में भी अपने बच्चों का स्वेच्छा से नाम नहीं रख पाते

 

जगदलपुर। बढ़ते संचार और मनोरंजन के साधनों के साथ- साथ ग्रामीण क्षेत्रों के बच्चों का नाम अब पारंपरिक जैसे बुधराम, ईतवारी, सोमारू जैसे नहीं रह पाए हैं। अब तो फिल्मी अभिनेता और टीवी सीरियलों के पात्रों के नामों को लोग अपनाने लगे हैं, लेकिन दंतेवाड़ा जिले के कटे कल्याण ब्लाक के बड़ेगादम इलाके में निवासरत ग्रामीण आज भी अपने बच्चों का नामकरण करवाने के लिए बड्डे के पास जाते हैं, इतना ही नहीं बच्चे के नाम पर मुर्गा भी पालते हैं।

 

कटेकल्याण ब्लाक मुख्यालय से करीब 7 किलोमीटर दूर पहाड़ की गोद में बसे गंाव बड़ेगादम के ग्रामीण लाईट या बिजली के ख्ंाभे इनके गंाव से काफी दूर होने के कारण न टीवी देखे हैं और न ही आज तक कोई सिनेेमा। इनका संपर्क कटे कल्याण कुआकोंडा और दंतेवाड़ा से है, जहां आज भी मंनोरजन के साधन नहीं हैं। कभी विडियो हॉल चला करते थे वे भी बंद पड़े हैं। बड़ेगादम तथा आसपास के गंावों में रहने वाले माडिय़ा जनजाति के लोगों के घरों में जब किसी बच्चे का जन्म होता तो वे स्वेच्छा से नवजात का नामकरण भी नहीं कर पाते। बच्चों के नामकरण का अधिकार बस्ती के बड्डे को ही है।

 

माडिय़ा नवजात बच्चे के नाम ही घर में मुर्गा भी पालते हैं और जब यह बच्चा तीन साल का हो जाता है, तब मुर्गे को मारकर सामूहिक भोज दिया जाता है। इस संबंध में कटे कल्याण के समडऱाम मंडावी, आयतूराम, बड़ेगादम की आयती एवं सोमड़ी ने बताया कि देवी-देवता और पूर्वजों के नाम नए बच्चे का नामकरण इसलिए किया जाता है, ताकि इस बहाने देवों और अपने पितामहों को याद  किया जा सके।

 

माडिय़ा जनजाति के लोग बुधवार को शुभ दिन मानते हैं और इसी दिन नवजात को लेकर बड्डे के घर जाते हैं। बड्डे ग्राम देवी की पूजा अर्चना के बाद नवजात का नामकरण करता है। यह नाम स्थानीय देवी- देवताओं या पूर्वजों के नाम पर रखे जाते हंै। इसलिए ग्रामीण क्षेत्रों में आयता, हिड़मा जैसे नाम ज्यादा प्रचलित हैं।

 

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