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गया में कालचक्रमूलतंत्र पूजा में पहुंचे 60 हजार श्रद्धालु 




(शैलेश कुमार पाण्डेय )
गया.परमपावन दलाई लामा के 3_1483401126के मंत्र ओं आः हूं हः हं फट्’ का उच्चारण के साथ कालचक्र पूजा शुरू हुई। विशेष कक्ष में उन्होंने अन्य भिक्षुओं के साथ इसकी शुरुआत की। कालचक्र के इस मंत्र को बीजाक्षर माना जाता है। इसमें ओं आः हूं, काय-वाक व चित्त क्रमशः वैरोचन, अमोघसिद्धि व अक्षोभ्य बोधिसत्व के प्रतीक माने जाते हैं।क्या हैं मंत्र शब्द के प्रतीक…
इसी तरह हं हूं फट् का प्रयोग ध्यानी बुद्धों व देवी की पूजा के समय किया जाता है। यह शून्यता को स्वीकार करने का परिचायक भी माना जाता है। इसके बाद दलाई लामा की उपस्थिति में भूमि पूजन किया गया। इसके माध्यम से देव कालचक्र व देवी विश्वात्मा समेत अन्य तांत्रिक देवताओं का आवाह्न किया गया व मंडल निर्माण की प्रक्रिया शुरू की गई।
क्या हैं मंत्र शब्द के प्रतीक
ओं, मूर्ध स्थान में सफेद रंग का, अः कंठ स्थान में लाल रंग का, हूं हृदय में नीले रंग का, प्रतिनिधित्व करता है। यह क्रमशः काय, वाक व चित्त का प्रतीक है। ध्यान स्थिर होने पर साधक फट् कहता है, जिससे ललाट से सफेद प्रकाश निकलकर सभी प्राणियों के ललाट में प्रवेश करता है व उन्हें विशुद्ध बनाता है। अहंकार खत्म होता है। कालचक्र पूजा के दौरान दीक्षित किए गए भिक्षुओं को दलाई लामा ने प्रारंभिक उपदेश दिया। इसका उद्देश्य उन्हें बोधिचित्त की ओर अग्रसर करना है। इस प्रवचन में उन्होंने नागार्जुन, कमलशील, ग्वालसे थोकमे सांगपो, गेशे लंगरी थंगवा व खुनु लामा तेनजीन ग्वालसेन की रचनाओं पर आधारित प्रेरक प्रसंगों की व्याख्या किया।
पूजा में पहुंचे 60 हजार श्रद्धालु
सोमवार को कालचक्र पूजा की शुरुआत 14वें दलाई लामा ने की। दो सत्रों में इसकी शुरुआत प्रात: सात बजे हुई। अभी तक पूजा में हिस्सा लेने लगभग 60 हजार श्रद्धालु बोधगया पहुंच चुके हैं। सुरक्षा व्यवस्था कड़ी रहने के कारण लोगों को परेशानी हो रही है, फिर भी लोग प्रशासन की मदद कर रहे हैं। पूजा समाप्ति के बाद भीड़ के निकालने का उचित प्रबंध नहीं दिखा। पानी छिड़काव के बावजूद सड़कों पर धूल उड़ी, इससे लेागों को परेशानी हुई।
सौ से अधिक विदेशी मीडिया पहुंची
कालचक्र पूजा के कवरेज के लिए सौ से अधिक विदेशी मीडिया बोधगया पहुंच चुके हैं। आयोजन समिति के अनुसार भारत के अलावा रूस, फ्रांस, जर्मनी, ताइवान, अमेरिका व मंगोलिया के मीडियाकर्मी पहुंच चुके हैं।
पूर्व थाई पीएम के भाई से की भेंट : कालचक्र पूजा शुरू करने से पहले दलाई लामा से थाई के पूर्व पीएम थकसिन सिनवात्रा के भाई पायाप सिनवात्रा ने भेंट की। 20 सदस्यीय शिष्टमंडल से उन्होंने कहा कि बौद्ध धर्म सभी को एकसूत्र में बांधता है। थेरवादी, महायानी व तंत्रयान परंपरा सभी भगवान बुद्ध की आराधना करते हैं।
शंबल तिब्बत के शासक के निवेदन पर बुद्ध ने दिया था कालचक्र का ज्ञान
ज्ञान प्राप्ति के एक साल बाद मध्य एशिया के शंबल(तिब्बत) के शासक सुचंद्र के निवेदन पर भगवान बुद्ध ने कालचक्र का उपदेश दिया था। यह उपदेश दक्षिण भारत के धन्यकटक के स्तूप में दिया गया था। उन्होंने अनुत्तर योग तंत्र के साथ-साथ यमनांतक, चक्रसंभार तंत्र सहित अन्य तंत्रों का संचरण किया। इसी समय भगवान बुद्ध ने राजगीर के गृद्धकूट पर्वत पर प्रज्ञापारमिता का भी उपदेश किया। 12 हजार मूल मंत्र सीखकर राजा सुचंद्र ने इसपर 60 हजार श्लोकों की रचना की। सात पीढ़ी के बाद मंजूश्रीकीर्ति ने मूलतंत्र पर एक हजार श्लोकों के साथ कालचक्र लघुतंत्र की रचना की। उनके उत्तराधिकारी पुंडरीक ने 12 हजार श्लोकों के साथ विमलप्रभा नामक भाष्य की रचना की। दो भारतीय पंडितों द्वारा कालचक्र परंपरा को भारत लाया गया।
तांत्रिक साधना है कालचक्र
कालचक्र पूजा एक तांत्रिक साधना है, जिसमें मंडल का निर्माण कर कालचक्र व विश्वात्मा को स्थापित किया जाता है। कालचक्र व विश्वात्मा को शिव-शक्ति का रूप माना जाता है। इसकी साधना से साधक अपने चित्त को बोधि की ओर ले जाने का प्रयास करता है। इस तंत्र साधना द्वारा आध्यात्मिक स्थितियों को पार कर पूर्ण ज्ञान प्राप्त करता है। इसी बोधि को प्राप्त करने वाले चित्त को शून्यता व करुणा का अभिन्न यप कहा गया

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