बिहार की राजनीति का खेल ,  नीतीश हुए पास लालू हुए फेल

आखिर बीस माह बाद बिहार में महागठबंधन टूट गया . नीतीश के राज्यपाल को इस्तीफा सौंपने जाने के पहले लालू ने आरजेडी की मीटिंग के बाद लगभग चुनौति भरे अंदाज़ में कहा था , ‘ नीतीश कुमार को मैंने सीएम बनाया अगर बोझ नहीं ढो सकते तो वो समझें.‘ और उसके घंटे भर के अंदर नीतीश बोझ मुक्त हो गये . हमारे एक साथी ने कहा . तो मैं  भी नीतीश की तारीफ में बोल उठा, ऐसा कर नीतीश ने अपने आप को अन्य कुर्सी लोभी राजनेताओं की जमात से अलग दिखा  दिया . वैसे भी सुशासन बाबू ने 2014 में संसद चुनाव के वक़्त बिहार में अपनी पार्टी की करारी हार की नैतिक ज़िम्मेदारी लेते हुए मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा दे दिया था जिसके कारण उनके द्वारा बनाये गये मुख्यमंत्री जीतन राम मांझी ने उन्हें बहुत छकाया था . इस बार लालू फैमिली की ,दबंग भ्रष्टाचारी,  समानांतर सरकार ने उन्हें बहुत पापड़ बेलवाया . अंततः लालू को शह मात के खेल में , दी गई समय सीमा में तेजस्वी यादव द्वारा स्पष्टीकरण नहीं देने पर तुरंत इस्तीफा देकर नीतीश ने बाज़ी मार ली . अब उसी पहले साथी ने पूछा , इस्तीफा नीतीश ने दिया और मात लालू की कैसे ? अब पत्रकार माधो मुस्कुराते हुए बोले , लालू के पास कई ऑप्शन थे जिससे वे नीतीश पर अपनी सवारी बनाये रख सकते थे . पहला ऑप्शन यह था कि तेजस्वी का इस्तीफा दिलवा अपनी दूसरी बेटी रोहिणी या किसी अन्य को उप मुख्यमंत्री बनवा देते . ऐसे में वह गठबंधन में नैतिक मूल्यों का पालन करने वाले बने रहते और नीतीश को छुटकारा नहीं मिलता .दूसरा ऑप्शन यह होता कि वह तेजस्वी से इस्तीफा दिलवाते और  पूरी सरकार से आरजेडी के मंत्री इस्तीफा देकर बाहर से ही नीतीश सरकार को निःशर्त समर्थन की घोषणा कर देते . ऐसे में भी वे अपरोक्ष रूप से सत्ता पर नियंत्रण बनाये रखते . इन दोनों ही कंडीशन में नीतीश उनसे छुटकारा नहीं पा सकते थे . अब उसी साथी ने फिर पूछा , इस सब से लालू की नुकसान हुआ पर नीतीश का क्या फायदा ? अब मैं बोला , निश्चित तौर पर नीतीश की पुरानी सहयोगी बीजेपी उसे बाहर से समर्थन दे सकती है , फिर धीरे से सरकार में शामिल भी हो सकती है . वैसे नीतीश ने पहले गठबंधन प्रधानमंत्री पद की महत्वाकांक्षा के कारण , नरेंद्र मोदी से खुन्नस दिखाते हुए तोड़ा था . अभी की स्थित में उन्हें समझ आ गया कि मोदीजी का कद बहुत बड़ा हो गया है व संयुक्त विपक्ष से वे आशावान नहीं रह सकते हैं . मौके व परिस्थिति को भांपकर उन्होंने 2 हफ्ते पहले ही जता दिया था कि वे अगले प्रधान मंत्री की रेस में नहीं हैं . यह मोदीजी व बीजेपी के लिये भी दिलासा देने वाली बात थी इसलिये बीजेपी ने भी उन्हे महागठबंधन तोड़ने पर खुलकर समर्थन देने की घोषणा कर दी थी . इसके अतिरिक्त यदि मान लें कि बिहार में कोई सरकार बनाने का कॉम्बीनेशन नहीं बनता है तो चुनाव होने की स्थिति में लालूका सूपड़ा साफ और नीतीश की स्थिति में सुधार की ज़्यादा संभावनाएं बनती हैं .

LEAVE A REPLY