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बलौदाबाजार। सोनाखान का नाम सुनते ही लोगो के मानस पटल पर सन 1857 के प्रथम क्रांति के जनक सोनाखान के धरती में जन्मे इस छेत्र के वीर बेटे शहीदवीर नायायण सिंह के वीरता की गाथाएं छा जाती है।प्रजा हित में हमेशा तत्पर रहने वाले वीर नारायण सिंह की वीरता से अंग्रेजी हुकूमत भी थर्राती
थी ।अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ विद्रोह का आगाज करने वाले वीर नारायण सिंह को पकड़ने तत्कालीन ब्रिटिश डिप्टी कमिश्नर लार्ड ईलियट एवं ब्रिटिश सेना के कैप्टन स्मिथ को लोहे के चने चबाने पड़ गए।जब अंग्रेजी सेना उसे पकड़ने में असफल रही तो उसे पकड़ने अंग्रेजी हुकूमत को षडयंत्र का सहारा लेना पड़ गया और राजदेवरी के तत्कालीन जमींदार जो कि उसके रिश्तेदार थे के सहयोग से उन्हें अंग्रेजों ने गिरफ्तार कर लिया और 10 दिसम्बर को छत्तीसगढ़ के राजधानी रायपुर के जयस्तंभ चौक में उन्हें सरेआम फाँसी दे दी गई।

सत्रहवीं सदी में सोनाखान राज्य की स्थापना की गई थी। इनके पूर्वज सारंगढ़ के जमींदार के वशंज थे। सोनाखान का प्राचीन नाम सिंघगढ़ था। कुर्रूपाट डोंगरी में युवराज नारायण सिंह के वीरगाथा का जिन्दा इतिहास दफन है। युवराज नारायण सिंह के पास एक घोड़ा था जो कि स्वामीभक्त था। वे घोड़े पर सवार होकर अपने रियासत का भ्रमण किया करत थे। भ्रमण के दौरान एक बार युवराज को किसी व्यक्ति ने जानकारी दी कि सोनाखान क्षेत्र में एक नरभक्षी शेर कुछ दिनों से आतंक मचा रहा है जिसके चलते प्रजा भयभीत है। प्रजा की सेवा करने में तत्पर नारायण सिंह ने तत्काल तलवार हाथ में लिए नरभक्षी शेर की ओर दौड़ पड़े और कुछ ही पल में शेर को ढेर कर दिए। इस प्रकार से वीर नारायण सिंह ने शेर का काम तमाम कर भयभीत प्रजा को नि:शंक बनाया। उनकी इस बहादुरी से प्रभावित होकर ब्रिटिश सरकार ने उन्हें वीर की पदवी से सम्मानित किया। इस सम्मान के बाद से युवराज वीरनारायण सिंह के नाम से प्रसिध्द हुए।

प्रजा हितैषी का एक अन्य उदाहरण सन् 1856 में पड़ा अकाल है जिसमें नारायण सिंह ने हजारों किसानों को साथ लेकर कसडोल के जमाखोरों के गोदामों पर धावा बोलकर सारे अनाज लूट लिए व दाने-दाने को तरस रहे अपने प्रजा में बांट दिए। इस घटना की शिकायत उस समय डिप्टी कमिश्नर इलियट से की गई। वीरनारायण सिंह ने शिकायत की भनक लगते हुए कुर्रूपाट डोंगरी को अपना आश्रय बना लिया। ज्ञातव्य है कि कुर्रूपाट गोड़, बिंझवार राजाओं के देवता हैं। अंतत: ब्रिटिश सरकार ने देवरी के जमींदार जो नारायण सिंह के बहनोई थे के सहयोग से छलपूर्वक देशद्रोही व लुटेरा का बेबुनियाद आरोप लगाकर उन्हें बंदी बना लिया। 10 दिसम्बर 1857 को रायपुर के चौराहे वर्तमान में जयस्तंभ चौक पर बांधकर वीरनारायण सिंह को फांसी दी गई। बाद में उनके शव को तोप से उड़ा दिया गया और इस तरह से भारत के एक सच्चे देशभक्त की जीवनलीला समाप्त हो गई। उल्लेखनीय है कि गोंडवाना के शेर कहे जाने वाले अमर शहीद वीरनारायण सिंह को राज्य का प्रथम स्वतंत्रता संग्राम सेनानी का दर्जा प्राप्त है।

वीर नारायण सिंह को पकड़ने अंग्रेजी सेना के कप्तान स्मिथ के नेतृत्व में 3000 सैनिकों की टुकड़ी सोनाखान के जंगल में स्थित कुर्रूपाठ की पहाड़ी को जहाँ पर वीर नारायण सिंह अपने कुल देवता के पास शरण लिए हुए थे चारों ओर से घेर लिए थे।अंग्रेजी सेना द्वारा पहाड़ी को चारों तरफ से घेर लिए जाने की भनक लगते ही वीरनारायण सिंह पहाड़ी के जिस गुफा में छिपे हुए थे उसके सुरंग के रास्ते वहाँ से भाग निकले।वीरनारायण सिंह के वीरता से परिचित कैप्टन स्मिथ को वीरनारायण सिंह के गुफा छिपे होने का अहसास होते ही उसने पहाड़ी के ऊपर ड्रील करके पहाड़ी को बारूद से उड़ाने का प्रयास किया जिससे गुफा के रास्ते अब बन्द हो गए हैं।क़ुर्रूपाठ के पहाड़ी के ऊपर अंग्रेजों द्वारा किए गए ड्रील आज भी पहाड़ी के ऊपर मौजूद है।क़ुर्रूपाठ की पहाड़ी के नीचे पास ही एक कुण्ड है जिसमें बारहों महीने पानी भरा रहता है कभी नहीं सूखता।गुफा से वीर नारायण सिंह को पकड़ने में असफल अंग्रेजी हुकूमत ने उन्हें गिरफ्तार करने के लिए षडयंत्र का सहारा लेते हुए उनके बहनोई देवरी के जमींदार महराज साय के माध्यम से उन्हें गिरफ्तार करने में सफलता प्राप्त की और अंग्रेजों ने उनके ऊपर राजद्रोह का मामला बनाते हुए प्राणदण्ड की सजा सुनाई तथा उन्हें छत्तीसगढ़ के वर्तमान राजधानी रायपुर के चौक में उन्हें सरेआम फाँसी दे दी गई ,जो कि आज

इनके सम्मान में फिलहाल प्रदेश शासन के आदि जाति कल्याण विभाग ने उनकी स्मृति में पुरस्कार की स्थापना की है। इसके तहत राज्य के अनुसूचित जनजातियों में सामाजिक चेतना जागृत करने तथा उत्थान के क्षेत्र में उत्कृष्ट कार्य करने वाले व्यक्तियों तथा स्वैच्छिक संस्थाओं को दो लाख रुपए की नगद राशि व प्रशस्ति पत्र देने का प्रावधान है।

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