नई दिल्ली./ सरकार ने गुरुवार को ऐलान किया कि वो अब शहीदों के बच्चों की पढ़ाई का पूरा खर्च उठाएगी।

पहले भी सरकार इन बच्चों की पढ़ाई के लिए फंडिंग करती थी, लेकिन एजुकेशन कंसेशन के तहत 10 हजार की लिमिट तय की गई थी और इसे अब हटा लिया है। रक्षा मंत्रालय ने अपने ट्विटर हैंडल पर इस फैसले की जानकारी दी। आदेश को वित्त मंत्री अरुण जेटली ने मंजूरी दी है।

लिमिट कब तय की गई थी? – हॉस्टल और ट्यूशन खर्चों के लिए 10 हजार की लिमिट 13 सितंबर 2017 को रक्षा मंत्री के पूर्व-सैनिक कल्याण विभाग ने तय की थी। ये आदेश 1 जुलाई 2017 से प्रभाव में आया था।

कब हटाई गई लिमिट, किसे फायदा मिलेगा? –

21 मार्च 2018 के आदेश में कहा गया कि इस लिमिट को हटा दिया गया है। सरकारी, सरकार से सहायता प्राप्त, मिलिट्री स्कूलों और केंद्र या राज्य सरकार द्वारा मान्यता प्राप्त स्कूलों में पढ़ाई करने वाले शहीदों के बच्चों की पढ़ाई का खर्च उठाया जाएगा।

लिमिट तय किए जाने का क्या असर हुआ था? –

जनवरी में रक्षा राज्य मंत्री सुभाष भामरे ने राज्यसभा में जवाब दिया था कि 2017-18 के दौरान 2,679 बच्चों ने इस स्कीम के तहत लिमिट से ज्यादा राशि ट्यूशन और हॉस्टल फीस के लिए हासिल की थी। इस दौरान बचत करीब 3 करोड़ रही। लेकिन, 2017-18 में ही जब लिमिट तय किए जाने का आदेश प्रभावी हुआ, तब इससे 250 बच्चे प्रभावित हुए। अब तक इस स्कीम के तहत प्रतिवर्ष किसी छात्र के लिए जो सबसे ज्यादा राशि दी गई है, वो 18.95 लाख है।

सरकार ने फैसले पर दोबारा विचार क्यों किया? –

रिपोर्ट्स में कहा गया था कि रक्षा मंत्रालय इस फैसले पर दोबारा विचार कर रहा है, क्योंकि ये लिमिट तय किए जाने का सेना, नौसेना, वायुसेना के प्रमुखों ने मिलकर विरोध किया था। चीफ ऑफ स्टाफ कमेटी (CoSC) जिसमें ये तीनों प्रमुख शामिल होते हैं, इन्होंने रक्षा मंत्रालय को लिखा था कि फैसले को बदला जाना चाहिए और 10 हजार की लिमिट को हटाया जाना चाहिए।  – नेवी चीफ एडमिरल सुनील लांबा ने लिखा था, “ये छोटा सा कदम हमारे बहादुर महिलाओं और पुरुषों के परिवारों में ये भरोसा जगाएगा कि देश को उनकी फिक्र है और सरकार सच्चे मायनों में उनकी शहादत की कद्र करती है। इन जवानों ने देश के लिए सर्वोच्च बलिदान दिया है।

”  पहली बार इस स्कीम का ऐलान कब हुआ था? –

18 दिसंबर 1971 को लोकसभा में पहली बार इस स्कीम का ऐलान किया गया था, तब दो दिन पहले ही पाकिस्तानी सेनाओं ने ढाका में आत्मसमर्पण किया था। इसके बाद इस स्कीम को ऑपरेशन मेघदूत, ऑपरेशन पवन और काउंटर इंसर्जेंसी ऑपरेशन तक बढ़ा दिया गया। इसमें उन लोगों के बच्चों की ट्यूशन फीस और हॉस्टल फीस और दूसरे खर्चों का पूरा री-इम्बर्समेंट किया जाता था, जो ड्यूटी के दौरान शहीद हुए या दिव्यांग हो गए।

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