सुखी जीवन का आधार-नशामुक्त संसार
बच्चों को नशे से दूर रखने में अभिभावकों का अहम रोल
    सुखी जीवन का आधार नशामुक्त संसार ही है। मानव जीवन अनमोल है। सुख दुख हमारे जीवन के दो पहलू हैं, जिनके अनुभवों से हम अपने जीवन में आगे बढ़ने के लिए निरन्तर प्रयासरत रहते हैं। जीवन में आगे बढ़ते हुए अनेक बार मनुष्य सुख और दःुख की आड़ में किसी न किसी प्रकार के नशे का सहारा लेने लगता है। कई बार युवा पीढ़ी आधुनिक दिखने की होड़ में नशे को अपना लेती है। इन सब अवस्थाओं में जीवन से भटक कर मनुष्य गलत आदतें अपना लेता है जिसके लिए उसे जीवन भर पछताना पड़ता है।
युवा वर्ग हमारे जीवन का अभिन्न अंग है। हमारा कुछ युवा वर्ग किशोरावस्था में ही आधुनिकता की चकाचौंध से भ्रमित होकर जिज्ञासावश नशीले पदार्थों के सेवन का शिकार हो जाते हैं। उन्हें यह मालूम नहीं होता है कि वे धीरे-धीरे नशों के आदि होते जा रहे हैं और साथ-साथ लाईलाज बीमारियों से ग्रसित हो जाते हैं।
  धुम्रपान से जहां कैंसर, सांस का रोग, दमा, खांसी इत्यादि, हृदय रोग तथा गैंगरीन जैसे लाईलाज रोग पैदा होते हैं, वहीं बीड़ी, सिगरेट से फैलने वाले धुएं से अप्रत्यक्ष रूप से गर्भवती महिलाएं व मासूम बच्चे भी भयानक रोगों की चपेट में आ जाते हैं।
नशा एक धीमा जहर है जो व्यक्ति को मानसिक, शारीरिक सामाजिक एवं आर्थिक रूप से कमजोर करता है। इसके लगातार सेवन से व्यक्ति अनेक प्रकार के रोगों से ग्रसित हो जाता है। नशा करने वाला स्वयं तो मौत का ग्रास बनता ही है, लेकिन वह समाज विशेषकर अपने परिजनों के लिए भी दुख का कारण बनता है। नशा कोई भी हो, वह व्यक्ति के शारीरिक एवं बौद्धिक विकास व स्मरण शक्ति को क्षीण बनाकर उसकी रचनात्मकता को दुर्बल बनाता है।
नशे के सेवन से व्यक्ति सदैव चिन्तित व उदासीन रहता है तथा हाथों में पसीना, अकेले में रहने की प्रवृति, भूख न लगना, वजन कम होना, आंखों में लाली, सूजन का होना, आवाज का लड़खड़ाना, शरीर में इन्जेक्शन लगाने के निशान तथा कपडे़ मे रक्त के धब्बे, उल्टी आना, शरीर में दर्द रहना, चक्कर आना, सुस्त रहना, अत्यधिक नींद आना, थकान एवं चिडचिड़ापन, याददाशत कमजोर होने, काम में मन न लगना, दैनिक कार्यो और खेलकूद में रूचि कम होना मुख्य रूप से नशे के ही लक्षण है।
नशे का सेवन घातक है। अनेक परीक्षणों से पता चलता है कि तम्बाकू में करीब 500 ऐसे रसायन पाये जाते हैं जो व्यक्ति के स्वास्थ्य के लिए अत्यन्त हानिकारक हैं। नशे के सेवन से शारिरक विकार जैसे मुंह, गले, लीवर, फेफड़े, दिल, गुर्दे व त्वचा में संग्रमण हो सकता है। इसके अतिरिक्त मुंह, गले, आंत, लीवर व फेफड़ों का कैंसर हो सकता है। नशा परिवारिक कलह व झगड़ों को जन्म देता है। नशे के सेवन वाला व्यक्ति चोरी, डकैती, व्यभिचार, तस्करी जैसे अपराधों में संलिप्त हो जाते हैं तथा समाज ऐसे व्यक्तियों की गणना बुरे व्यक्तियों में करता है जिससे व हीन भावना से ग्रस्त हो जाते हैं।
  बच्चों को नशे से दूर रखने के लिए अभिभावकों का अहम रोल होता है। माता-पिता को चाहिए की वह बच्चों का पूरा-पूरा ध्यान रखें तथा उनके साथ अधिक से अधिक समय बिताएं तथा बच्चों व उनके साथियों की गतिविधियों पर पूरा-पूरा ध्यान रखें। बच्चों की भावनाओं व रूचियों का पूरा-पूरा ध्यान रखें। मां-बाप को चाहिए कि वह बच्चों के लिए आदर्श बनें क्योंकि वे ही यदि नशे का सेवन करेगें तो बच्चे नकल करेगें ही। यदि बच्चा नशे का शिकार है तो तुरन्त डाक्टर से परामर्श लें। समय पर उपचार से नशे से मुक्ति पाई जा सकती है।
रेडक्रास के अध्यक्ष एवं उपायुक्त कांगड़ा संदीप कुमार का कहना है कि धर्मशाला में प्रयास भवन में नशा मुक्ति केन्द्र स्थापित किया गया है। यहां नशा निवारण केन्द्र में हजारों की संख्या में आए नशे की बुरी लत की गिरफ्त में फसें व्यक्तियों ने नशे के सेवन से निजात पाई है। इस केन्द्र में नशे के चुगंल से छुटकारा पाने के लिए इस वर्ष 302 व्यक्ति जिनमें से 211 तो उपचार के लिए केन्द्र में भर्ती हुए हैं और 91 व्यक्तियों ने बाह्य रोगी के तौर पर उपचार तथा परामर्श प्राप्त किया है और सभी नशा सेवन की लत से मुक्त हो कर गए हैं।
युवा देश का भविष्य है। युवा वर्ग यदि स्वस्थ, सशक्त होगा तभी देश प्रगति के पथ पर अग्रसर होगा।

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