उत्तर प्रदेश से बड़ी खबर:-
प्रमुख सचिव गृह अरविंद कुमार ने बताया कि 1 जून को राष्ट्रपति ने इस संशोधन विधेयक को मंजूरी दे दी। 6 जून से यह कानून यूपी में लागू हो गया है। उन्होंने बताया कि यूपी में 1976 में आपातकाल के दौरान अग्रिम जमानत की व्यवस्था खत्म कर दी गई थी। यूपी और उत्तराखंड को छोड़कर बाकी प्रदेशों में यह व्यवस्था बाद में शुरू हो गई।

संज्ञेय अपराधों में अरेस्ट स्टे के लिए हाई कोर्ट में लगातार याचिकाएं आ रही थीं, इससे कोर्ट पर काफी दबाव पड़ रहा था। हाई कोर्ट और सुप्रीम कोर्ट ने इस कानून को फिर से लागू करने के लिए राज्य सरकार से कहा था। राज्य विधि आयोग ने भी 2009 में अपनी तृतीय रिपोर्ट में इस व्यवस्था को फिर से लागू करने की सिफारिश की थी।

क्या होंगी शर्तें
-अग्रिम जमानत की याचिका पर सुनवाई के दौरान अभियुक्त का उपस्थित रहना जरूरी नहीं।
-जिस दौरान पूछताछ के लिए बुलाया जाएगा, अभियुक्त को पुलिस या विवेचक के सामने उपस्थित होना पड़ेगा।
-आवेदक मामले से जुड़े गवाहों व अन्य व्यक्तियों को धमका नहीं सकेगा, न ही कोई आश्वासन दे सकेगा।

इन मामलों में नहीं मिलेगी अग्रिम जमानत
-अग्रिम जमानत की व्यवस्था एससी-एसटी एक्ट समेत अन्य गंभीर अपराध के मामलों में लागू नहीं होगी। -आतंकी गतिविधियों से जुड़े मामलों (अनलॉफुल एक्टिविटी ऐक्ट 1967) आफिशियल एक्ट, नारकोटिक्स एक्ट, गैंगस्टर एक्ट व मौत की सजा से जुड़े मुकदमों में अग्रिम जमानत नहीं मिल सकेगी।

30 दिन में करना होगा निस्तारण
राष्ट्रपति द्वारा मंजूर किए गए विधेयक के मुताबिक अग्रिम जमानत के लिए आवेदन की तिथि से 30 दिन के अंदर निस्तारण करना होगा। कोर्ट को अंतिम सुनवाई से सात दिन पहले लोक अभियोजक को नोटिस भेजना जरूरी होगा। अग्रिम जमानत से जुड़े मामलों में कोर्ट अभियोग की प्रकृति और गंभीरता, आवेदक के इतिहास, उसकी न्याय से भागने की प्रवृत्ति पर विचार कर उसके आधार पर फैसला ले सकती है।

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