वक्त का मारा तैराक युवाओं को देता है प्रशिक्षण
गिनीज बुक में नाम दर्ज कराने का सपना रह गया अधूरा
1987 में पहली बार बिहार का किया था प्रतिनिधित्व
गंगा में नाव डूबने की घटना होती है तो सबसे पहले उन्हें ही खोजा जाता है। गंगा की लहरों में फंसे कई जिंदगियों को बचा चुके हैं। मकर संक्राति के समय गंगा में हुए नाव हादसे में भी इनके शिष्यों ने कई लोगों की जान भी बचाई। राष्टट्रीय स्तर के तैराक हैं और तैराकी इनके खून में है।
तैराकी में कई मेडल अपने नाम कर चुके हैं, लेकिन चाय बेच कर जीवनयापन करने को मजबूर हैं। काजीपुर, नयाटोला स्थित एक छोटी सी चाय की दुकान चलाने वाले राष्टÑीय स्तर का तैराक गोपाल प्रसाद यादव बिहार में खेल और खिलाड़ियों की बदहाली का एक ज्वलंत उदाहरण हैं। तैराकी को अपना कॅरियर बनाकर बिहार का नाम रोशन करने वाला गोाल आज तंग गलियारें में चाय बेचने को मजबूर हैं। राष्टÑीय स्तर पर बिहार का प्रतिधित्व करने वाले गोपाल प्रसाद सिस्टम से पीड़ित हैं। अंतरराष्टÑीय तैराक बनने का सपना देखने वाले गोपाल परिवारिक जिम्मेदारियों और आर्थिक बदहाली के कारण चाय बेचते हैं।
अपनी दुकान पर पसीना से लथपथ गोपाल प्रसाद लोगों को चाय पिलाने में लगे थे। दुकान का नाम नेशनल तैराक टी स्टॉल क्यों रखा है। इस पर उन्होंने बताया कि यह खिलाड़ियों की दुर्दशा को बयां करता है। लोग समझते तो हैं कि राष्टÑीय स्तर का खिलाड़ी चाय बेचकर गुजर बसर कर रहा है। गोपाल कहते हैं कि गिनीज बुक में नाम दर्ज कराने का उनका सपना अधूरा रह गया है। इसके लिए वह सरकारी अनदेखी को जिम्मेदार ठहराते हैं। अभी भी इतनी काबिलियत बची है कि मेडल जीतकर ला सकें।
ऐसे कई खिलाड़ी है जो आज ऐसे जिन्दगी जीने को मजबूर हैं, इन्हें देखने के लिए सरकार के पास कोई वक्त नहीं है। ऐसे प्रतिभावान खिलाड़ियों को सरकार की तरफ से हर संभव मदद मिलनी चाहिए थी जो एक मिशाल बनती। लोग अपने बच्चों को प्रेरित करते की स्पोटर्स में भी कॅरियर बनाया जा सकता है। लेकिन इनकी हालात को देख कर भला कौन मां-बाप चाहेगा की उनके बच्चों का भी कॅरियर अंधकार से भरा हो और वो भी चाय बेचने को मजबूर हो। सरकार बहूत सारे प्रोग्राम चला रही है जैसे की बाढ़ सुरक्षा कार्यक्रम। ऐसे लोगों को चिह्नीत कर इस कार्यक्रम से जोड़ा जा सकता है। और इनके हुनर का लाभ लाखों लोगों तक पहुंचाया जा सकता है। हर साल बाढ़ में डूबकर हजारों लोग अपनी जान गवां देते हैं। ऐसे में गोपाल प्रासाद यादव जैसे नेशनल तैराक को इस कार्यक्रम से जोड़ कर इनके हुनर का लाभ ले सकते हैं, और इनको अंधकार भरी जिन्दगी से निजात मिल सके।
उपलब्धियां
साल 1987 में कोलकाता में आयोजित राष्टÑीय तैराकी प्रतियोगिता में पहली बार गोपाल को बिहार का प्रतिनिधित्व करने का अवसर मिला। उसके बाद 1988 और 1989 में केरल में आयोजित राष्टÑीय तैराी प्रतियोगिता में उन्होंने बेहतरीन प्रदर्शन किया। वहीं, साल 1988 में बीसीए दानापुर में आयोजित स्टेट चैंपियनशिप के 100 मीटर बैक स्ट्रोक चैंपियनशिप में वह पहले स्थान पर आए। 200 मीटर और 100 मीटर की सामान्य तैराकी में तीसरा मुकाम हासिल किया।
गंगा किनारे तैराकी सिखा रहे हैं गोपाल
गोपाल गंगा की लहरों में युवाओं को तैराकी सिखाते हैं। बतौर तैराकी शिक्षक उन्होंने अपने अंदर के तैराक को जीवित रखा हैं। गोपाल प्रसाद कहते है कि मेरे दोनों बेटे सन्नी कुमार, सोनू कुमार अच्छे तैराक हैं, लेकिन मेरी हालत देखकर तैराकी छोड़ दी। 1990 में पोस्टल डिपार्टमेंट में नौकरी के लिए इंटरव्यू देने भी गए थे, लेकिन इससे पहले पैरवी वाले को नौकरी मिल गई।

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