अशोक कुमार, दस्तक टाइम्स इण्डिया हरिद्वार उ०ख०।

वन्दना शर्मा ने जिन्दगी के हर पल के संघर्ष करती हुई एक कवयित्री बनी । जब वन्दना शर्मा मात्र आठ वर्ष की थी तो उन्होनें ने देखा कि समाज में स्त्री के साथ किस -किस तरह के दुर्व्यवाहार हो रहे ।यह देख कर वन्दना जी का दिल चीख उठा, तब उन्होनें समाज को बदलने के लिए साहित्य का सहारा लेकर अपनी कलम उठाई । जो उन्होनें अपनी कलम से प्रथम रचना लिखी है – “सुनो विधाता”
मैं अपने कर्मकर रही विधाता,
क्यूँ तू चाहे मुझे झुकाना ।
मेरा संयम तू क्या तौलेगा,
पूरी कर ले मन की चाहे जितना सताना ।
तेरा हर गूढ़ रहस्य मैं जानूँ,
मैं तेरी भी जननी हूँ क्या चाहे समझाना ।
इस रचना के बाद उन्होनें करूण रस, वीर रस और श्रंगार रस में अनेकों रचनायें लिखी है । वन्दना शर्मा जी की रचनाएं देश के प्रतिष्ठित समाचार पत्र व पत्रिकाओं में निरन्तर प्रकाशित होती रही है । कई साहित्यिक संस्थाओं से इन्हें अनेक राष्ट्रीय सम्मान भी प्राप्त हुये हैं।और विबिन्न मंचों द्वारा सम्मान से सम्मानित की जा चुकी है,जो इनका पहला काव्य संग्रह “मुस्कराते दर्द” है
इस संग्रह में करूण रस से भरी हृदय स्पर्शी 59 कवितायें संकलित हैं । इंनकलाब पत्रिका के सम्पादक सागर यादव जख्मी जी का यह कहना है कि इनको इस वक्त की महादेवी वर्मा भी कहा जाये तो कोई अतिश्योक्ति नही होगी ।

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