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हिंदुत्व के मुद्दे पर शिवसेना ने एक बार फिर भाजपा को आक्रामक होने का दिया मौका

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मुंबई। हिंदुत्व के मुद्दे पर शिवसेना ने एक बार फिर भाजपा को आक्रामक होने का मौका दे दिया है, जबकि वह स्वयं इस मुद्दे पर मौन साधे दिख रही है। सत्ता में आने के बाद यह स्थिति पहली बार नहीं पैदा हुई है। लॉकडाउन के दौरान मुंबई के निकट पालघर जनपद में दो साधुओं समेत तीन लोगों की बर्बर हत्या से शुरू हुई यह कहानी अब शरजील उस्मानी तक आ चुकी है। सत्ता में बैठे शिवसेना के नेता चाहे जो दावा करें, लेकिन कल्पना नहीं की जा सकती कि यह बालासाहब ठाकरे वाली ही शिवसेना है।

यही कारण है कि भाजपा नेता देवेंद्र फड़नवीस द्वारा मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे को लिखी गई चिट्ठी में बाकायदा शरजील उस्मानी के कहे शब्दों को उद्धृत करना पड़ा है। जिसमें वह हिंदुस्तान के हिंदू समाज के लिए ऐसे-ऐसे शब्दों का इस्तेमाल करता दिखाई दे रहा है, जिसे सुनकर बालासाहब ठाकरे की प्रतिक्रिया क्या होती, इसका अंदाजा खुद शिवसेना के नेता लगा सकते हैं। आश्चर्य यह कि जिस एलगार परिषद में शरजील उस्मानी ने ये बातें कहीं, उसका आयोजन शिवसेना शासित महाराष्ट्र में ही किया गया था, जिसके मुख्यमंत्री आजकल बालासाहब ठाकरे के पुत्र उद्धव ठाकरे हैं।

अयोध्या में विवादित ढांचा ढहाए जाने के बाद 1992-93 की बात भूल भी जाएं तो 11 अगस्त, 2012 को मुंबई के आजाद मैदान में आयोजित एक प्रदर्शन के दौरान कुछ हुड़दंगियों ने जब वहां बने अमर जवान स्मारक को तोड़कर महिला पुलिसकíमयों के साथ बदसलूकी की थी तो उसके कुछ दिन बाद ही पूरी मुंबई में बालासाहब ठाकरे की तस्वीर वाले बड़े-बड़े होìडग लगे दिखाई दिए थे, जिनपर लिखा था-एकटा टाइगर। यानी एक ही बाघ। ये होर्डिंग हुड़दंगियों के लिए एक संकेत मात्र थे। उसके बाद पूरी मुंबई शांत हो गई थी। यही नहीं, बालासाहब की गैरमौजूदगी में भी 31 दिसंबर, 2017 को पुणो के शनिवार वाड़ा के बाहर हुई एलगार परिषद एवं उसके अगले दिन से महाराष्ट्र में शुरू हुए जातीय दंगों के बाद शिवसेना ने तीखी प्रतिक्रिया जाहिर की थी। यह प्रतिक्रिया उसके उस स्वभाव से ही मेल खा रही थी, जिसका आदी आम शिवसैनिक रहा है। उन दिनों शिवसेना राज्य की सत्ता में भाजपा के साथ थी।

अब शिवसेना खुद सत्ता में वरिष्ठ साङोदार है। जिनसे बालासाहब ठाकरे आजीवन लड़ते रहे, वही कांग्रेस एवं राकांपा अब उसके साथ सत्ता में कनिष्ठ साङोदार हैं। शायद यही कारण है कि अब बाघ के दांत गिरे हुए दिखाई दे रहे हैं, और शरजील उस्मानी जैसे बाहर से आए हुए वक्ता सार्वजनिक मंच से हिंदू समाज को सड़ा हुआ कहने को स्वतंत्र हैं। आश्चर्य यह कि शरजील के इस बयान पर शिवसेना के कनिष्ठ साङोदार तो कसमसाते दिख रहे हैं, लेकिन शिवसेना अब भी मौन साधे बैठी है। राकांपा के मंत्री छगन भुजबल ने शरजील के बयान पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा है कि विचारों की स्वतंत्रता सबको है, लेकिन किसी धर्म पर आरोप लगाते हुए यह ध्यान रखा जाना चाहिए कि किसी की भावनाएं आहत न हों।

मुंबई कांग्रेस के महासचिव विश्वबंधु राय ने भी शरजील की बयानबाजी पर मकोका के तहत केस दर्ज कर उसकी गिरफ्तारी की मांग की है, लेकिन शिवसेना इन दिनों महाराष्ट्र के मसलों के बजाय दिल्ली की सीमाओं पर किसान आंदोलन को हवा देने में व्यस्त है। यह और बात है कि इसी 25 जनवरी को मुंबई के आजाद मैदान में हुए किसानों के कथित प्रदर्शन में जाने की फुरसत उसके किसी नेता को नहीं मिली थी। कृषि कानूनों पर संसद में भी वह भ्रमित ही दिखाई दी थी। शिवसेना का नेतृत्व भले ही अपने राजनीतिक हितों को देखते हुए वैचारिक करवट बदल रहा हो, लेकिन उसका प्रतिबद्ध मतदाता आम शिवसैनिक तो आज भी अपने घरों में बालासाहब ठाकरे की तस्वीर लगाकर रखता है। उसके माथे पर तो आज भी लाल रोली का लंबा टीका दिखाई देता है। उसे शरजील उस्मानी का यह वाक्य कैसे बर्दाश्त हो सकता है कि हिंदू समाज सड़ चुका है। दरअसल इसी आंतरिक द्वंद्व के कारण शिवसेना इन दिनों फिर से हिंदुत्ववाद से मराठीवाद की ओर पलटती दिखाई दे रही है। इसी प्रयास में उसने औरंगाबाद और उस्मानाबाद को क्रमश: संभाजीनगर एवं धाराशिव कहना शुरू कर दिया है।

मराठीवाद का ऐसा ही एक मुद्दा महाराष्ट्र-कर्नाटक सीमा विवाद भी शिवसेना ने हाल ही में खोज निकाला है। आजादी के बाद राज्यों के पुनर्गठन के समय से ही 814 मराठीभाषी गांव कर्नाटक में शामिल कर दिए गए थे। महाराष्ट्र इन गांवों को वापस पाने के लिए संघर्षरत है, लेकिन कर्नाटक ने अब उसी क्षेत्र में अपनी उपराजधानी बनाकर वहां विधानमंडल का सत्र बुलाना भी शुरू कर दिया है। फिलहाल यह मुद्दा सर्वोच्च न्यायालय में लंबित है। पिछले दिनों इस सीमा विवाद पर लिखी गई एक पुस्तक का लोकार्पण करते समय महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे ने सर्वोच्च न्यायालय का फैसला आने तक दोनों राज्यों की सीमा पर बसे मराठीभाषी गांवों को केंद्रशासित प्रदेश घोषित करने की मांग की। यह मुद्दा कब सुलझेगा, पता नहीं, लेकिन शिवसेना को लगता है कि महाराष्ट्र-कर्नाटक सीमा विवाद एवं औरंगाबाद-उस्मानाबाद के नामांतरण जैसे मुद्दे उसके खिसकते वोटबैंक को संभालने में मददगार होंगे। संभवत: इसीलिए वह शरजील उस्मानी के बयानों पर मौन रहकर ऐसे मुद्दों को हवा देने में व्यस्त है।

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