इन 7 तरह के ईटिंग डिसॉर्डर से रहें सावधान!

आप सबके सामने बहुत ज्यादा खाने से शरमाते हैं और छिप-छिप कर खाते हैं तो आप ईटिंग डिसॉर्डर के शिकार हैं। इसे नजरअंदाज करना बड़ी समस्याओं को आमंत्रण देना है, बता रही हैं शमीम खान

ईटिंग डिसॉर्डर खानपान की आदतों से संबंधित एक गंभीर स्थिति है, जो नकारात्मक रूप से आपके स्वास्थ्य, भावनाओं और कार्य करने की क्षमता को प्रभावित करती है। इस समस्या से ग्रस्त लोगों में खानपान की आदतें सामान्य नहीं रहतीं। कुछ लोग अपने शरीर की आवश्यकता से अधिक खाते हैं तो कई लोग उससे बहुत कम खाते हैं। कई लोग ऐसी चीजों का सेवन भी करते हैं, जो खाने के लिए नहीं होतीं। यह समस्या अधिकतर किशोरों और युवाओं में होती है।

ईटिंग डिसॉर्डर के प्रकार
एनारेक्सिया नवरेसा, बुलिमिया नवरेसा और बिंज ईटिंग डिसॉर्डर सबसे सामान्य प्रकार के डिसॉर्डर हैं। इसके अलावा कुछ और ईटिंग डिसॉर्डर हैं, जिनमें पिका, रूमिनेशन डिसॉर्डर और अवाइडेंट/रिस्ट्रक्टिव फूड इनटेक डिसॉर्डर प्रमुख हैं।

एनारेक्सिया नवरेसा
एनारेक्सिया नवरेसा को आम भाषा में एनारेक्सिया कहा जाता है। यह एक घातक ईटिंग डिसॉर्डर है। इसमें शरीर का वजन कम हो जाता है, क्योंकि जो लोग एनारेक्सिया से पीड़ित होते हैं, वे अपने भार और शरीर के आकार को नियंत्रित करने का अत्यधिक प्रयास करते हैं। इससे शारीरिक स्वास्थ्य और जीवन की सामान्य गतिविधियां प्रभावित होती हैं।

एनारेक्सिया से पीड़ित लोग कैलरी का सेवन अत्यधिक कम कर देते हैं या वजन कम करने के लिए दूसरे उपायों को अपनाते हैं। इसमें अत्यधिक व्यायाम करना, पेट साफ रखने के लिए लैक्जेटिव का सेवन या खाने के बाद उल्टी कर देना जैसी चीजें शामिल होती हैं। वजन कम करने के ये प्रयास तब भी जारी रहते हैं, जब वजन अत्यधिक कम हो जाता है। कभी-कभी इससे पीड़ित लोग खुद को इतना भूखा मारते हैं कि यह स्थिति उनके लिए घातक हो जाती है।

बुलिमिया नवरेसा
बुलिमिया घातक ईटिंग डिसॉर्डर है। इससे पीड़ित व्यक्ति का खानपान पर नियंत्रण नहीं रहता। ऐसे लोग थोड़े समय में ही अधिक मात्रा में खा लेते हैं और अस्वस्थ तरीके से उस अतिरिक्त कैलरी को कम करने का प्रयास करते हैं, क्योंकि अधिक खाने के बाद ऐसे लोग शर्म और अत्यधिक भय से भर जाते हैं। वजन बढ़ने के डर से वे उल्टी करने का प्रयास करते हैं, अत्यधिक व्यायाम करते हैं या लैक्जेटिव का उपयोग करते हैं, ताकि अतिरिक्त कैलरी मल द्वारा निकल जाए।

बिंज ईटिंग डिसॉर्डर
बिंज ईटिंग डिसॉर्डर से पीड़ित लोग नियमित रूप से अत्यधिक भोजन खाते हैं। ऐसे लोगों को इस बात का पूरा एहसास रहता है कि उनका अपने खानपान पर नियंत्रण नहीं रहा। बिंज के बाद भी लोग अपने व्यवहार के कारण आत्मग्लानि, गुस्से या शर्म से भर जाते हैं, लेकिन बुलिमिया की तरह वे इस अतिरिक्त कैलरी इनटेक को व्यायाम या दूसरे तरीकों से बाहर निकालने का प्रयास नहीं करते।

अन्य ईटिंग डिसॉर्डर
पिका :पिका एक ऐसा ईटिंग डिसॉर्डर है, जिसमें व्यक्ति को नॉनफूड आइटम खाने का मन करता है, जैसे साबुन, कपड़ा, टैलकम पाउडर, धूल, चॉक आदि। यह समस्या महीने में कम से कम एक बार तो होती ही है। पिका न स्वास्थ्य के लिए अच्छा है और न ही सामाजिक रूप से। लगातार इन चीजों के सेवन से स्वास्थ्य संबंधी कई जटिलताएं हो सकती हैं, जैसे पॉयजनिंग, पाचन मार्ग संबंधी समस्या या संक्रमण। पिका अकसर दूसरी स्वास्थ्य समस्याओं के साथ होता है, जैसे ऑटिज्म स्पेक्ट्रम डिसॉर्डर।

अवाइडेंट/रिस्ट्रक्टिव फूड इनटेक डिसॉर्डर (आरएफआईडी) : इससे पीड़ित व्यक्ति की प्रतिदिन की न्यूनतम पोषण आवश्यकताएं पूरी नहीं होतीं, क्योंकि उसकी खाने में रुचि नहीं होती। ऐसा व्यक्ति खाद्य पदार्थों के रंग, टेक्सचर, गंध या स्वाद के कारण कुछ खाद्य पदार्थों के सेवन से बचता है या खाने से डरता है।

इस कारण वजन बहुत कम हो जाता है या बचपन में वजन बढ़ने में समस्या होती है। इसके साथ ही पोषक तत्वों की कमी हो जाती है, जिस कारण कई समस्याएं हो जाती हैं।

रूमिनेशन डिसॉर्डर :रूमिनेशन डिसॉर्डर लगातार और स्थायी रूप से खाना खाने के बाद भोजन का वापस मुंह में आना है। यह किसी डॉक्टरी स्थिति या दूसरे किसी ईटिंग डिसॉर्डर के कारण नहीं होता। जी मिचलाने या उल्टी होने के कारण भोजन वापस मुंह में आता है। कभी-कभी मुंह में वापस आये भोजन को पुन: चबा लिया जाता है और निगल लिया जाता है या बाहर थूक दिया जाता है।

अगर भोजन को बाहर थूक दिया जाता है या इस समस्या से बचने के लिए व्यक्ति कम खाता है तो इसके कारण वह कुपोषण का शिकार हो जाता है। यह समस्या नवजात शिशुओं या उन लोगों में होने की आशंका अधिक रहती है, जिन्हें  इन्टलेक्चुअल डिसेबिलिटी होती है।

इस कारण होने वाली स्वास्थ्य जटिलताएं
ईटिंग डिसॉर्डर जितने लंबे समय तक चलेगा या गंभीर होगा, आपके गंभीर स्वास्थ्य जटिलताओं की चपेट में आने की आशंका उतनी ही बढ़ जाएगी।

क्या हैं उपचार
उपचार इस बात पर निर्भर करता है कि आपको कौन सा ईटिंग डिसॉर्डर है। सामान्यत: इसमें साइकोथेरेपी, पोषण के बारे में जानकारी देना और दवाएं सम्मिलित होती हैं। समस्या घातक स्तर तक पहुंच गई है तो तुरंत हॉस्पिटल में भर्ती कराने की जरूरत पड़ सकती है।

साइकोथेरेपी
साइकोथेरेपी को टॉक थेरेपी भी कहा जाता है। इसमें यह सीखने में सहायता की जाती है कि अस्वस्थ आदतों को स्वस्थ आदतों में कैसे बदला जाता है। इसमें दो प्रकार की थेरेपियां सम्मिलित होती हैं-काग्निटिव बिहेवियरल थेरेपी (सीबीटी) और फैमिली बेस्ड थेरेपी (एफबीटी)।

काग्निटिव बिहेवियरल थेरेपी (सीबीटी) : सीबीटी मुख्यतया बुलिमिया और बिंज ईटिंग डिसॉर्डर के लिए इस्तेमाल की जाती है। इसमें खानपान की आदतों को मॉनिटर करना, समस्याओं का समाधान करने का कौशल और तनावभरी स्थितियों से कैसे निपटा जाए, यह सिखाया जाता है।

फैमिली बेस्ड थेरेपी (एफबीटी) :इस थेरेपी का इस्तेमाल बच्चों और किशोरों के लिए किया जाता है, जो ईटिंग डिसॉर्डर से पीड़ित होते हैं। इसमें पूरे परिवार से चर्चा की जाती है और उन्हें  समझाया जाता है कि बच्चों  या परिवार के दूसरे सदस्यों के लिए ईटिंग हैबिट पैटर्न का कैसे पालन किया जाए और कैसे स्वस्थ भार को बनाए रखा जा सके।

दवाओं का इस्तेमाल
दवाओं से ईटिंग डिसॉर्डर का उपचार करना संभव नहीं है। हालांकि कुछ दवाएं हैं, जो बहुत अधिक या बहुत कम खाने से रोकने में सहायता कर सकती हैं। एंटी-डिप्रेशन या एंटी-एंग्जाइटी की दवाएं डिप्रेशन और एंग्जाइटी के लक्षणों को कम कर सकती हैं।

लक्षण
– मील स्किप करना या खाना न खाने के लिए बहाने बनाना।
– हेल्दी ईटिंग पर काफी फोकस करना।
– घर में जो कुछ बना है, उसे खाने की बजाय अपना खाना अलग से बनाना।
– सामाजिक गतिविधियों से दूर रहना।
– अपने शारीरिक आकार में कमियां ढूंढ़ने के लिए बार-बार शीशे में खुद को जांचना।
– बार-बार काफी मात्रा में मिठाइयां या उच्च वसा वाले भोजन का सेवन करना।
– वजन कम करने के लिए डाएट्री सप्लिमेंट्स, लैक्जेटिव या हर्बल उत्पादों का सेवन करना।
– छिप कर खाना।

क्या कहते हैं आंकड़े
05 गुनी अधिक होती है मृत्यु की आशंका एनरेक्सिया नवरेसा से पीड़ित लोगों की सामान्य लोगों की तुलना में।
20 वर्षों से ईटिंग डिसॉर्डर के मामले लगातार बढ़ रहे हैं।
90% से अधिक महिलाएं एनरेक्सिया से पीड़ित होती हैं, जिनकी उम्र 12 से 25 वर्ष के बीच होती है।

उपचार की सफलता दर
40-45% रोगी पूरी तरह ठीक हो जाते हैं।
20-25% गंभीर बीमारियों की चपेट में आ जाते हैं।
25-30%की स्थिति में सुधार आ जाता है।

जटिलताओं पर नजर रखें
डिप्रेशन और एंग्जाइटी
आत्महत्या का विचार आना
शरीर के विकास में समस्या आना
सामाजिक और संबंधों से जुड़ी समस्याएं सामने आना
नशे की लत लग जाना
लड़कियों में मासिक धर्म न आना
एनीमिया
हार्ट फेल्योर
बांझपन
(कैलाश हॉस्पिटल के सीनियर फिजिशियन डॉ. ए. के. शुक्ला व पायोनियर न्यूट्रिशन एंड वेलनेस सेंटर के वरिष्ठ डायटिशियन शहजाद अली से बातचीत पर आधारित।)

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