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बिहार विधानसभा का शताब्दी समारोह, जानिए 100 साल में किन बड़ी घटनाओं का गवाह बना भवन

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पटनाः बिहार विधानसभा भवन अपना शताब्दी समारोह मना रहा है। इन 100 सालों में विधानसभा भवन ने जमींदारी उन्‍मूलन से लेकर शराबबंदी तक देश को राह दिखाई है। इतना ही नहीं विधानसभा भवन ने अपने सीने के अंदर कुछ यादें भी दफन कर ली हैं।

बिहार विधानसभा भवन में 7 फरवरी 1921 को पहली बार विधानसभा में पहली बैठक हुई थी, उस समय विधानसभा का नाम ‘बिहार-उड़ीसा विधान परिषद’ भवन था। साथ ही आजादी के पहले विधानसभा भवन में ही पहली बार स्‍वदेशी उद्योगों को बढ़ावा देने में स्‍वदेशी चरखा की बात की गई थी। यही चरखा बाद में गांधीजी ने अपने जनांदोलन में शामिल किया। इतना ही नहीं विधानसभा भवन में ही जमींदारी उन्‍मूलन से लेकर शराबबंदी तक के कई ऐतिहासिक फैसले लिए गए थे। साल 2019 के बिहार लोक सेवाओं का अधिकार अधिनियम व बिहार लोक शिकायत निवारण अधिकार अधिनियम। इसी साल जल जीवन हरियाली अभियान का आरंभ देखा तो बिहार को विशेष राज्य का दर्जा देने का प्रस्ताव भी पारित हुआ।

सादगी, सुंदरता और भव्यता से किया गया विधानसभा भवन का निर्माण 
गवर्नमेंट ऑफ इंडिया अधिनियम 1919 के तहत अंग्रेजों से 2020 में बिहार एवं उड़ीसा को पूर्ण राज्य का दर्जा दिया। इसके बाद लॉर्ड सत्येन्द्र प्रसन्न सिन्हा बिहार में पहले राज्यपाल बनाए गए। अलग राज्य के लिए जब परिषद सचिवालय की जरूरत महसूस हुई, तब 1920 में भवन को आकार दिया गया। आर्किटेक्ट एएम मिलवुड ने इतालवी रेनेसां शैली में बनवाया। आगे साल 1935 के अधिनियम से जब बिहार विधानमंडल को 2 भागों में विभाजित कर दिया गया, तब भवन में परिषद वाले भाग में विधानसभा चलने लगी। इससे साथ विधान परिषद के लिए अलग से नया व छोटा भाग बनाया गया।

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बता दें कि विधानसभा भवन में 3 हाल और बीच में 12 कमरे हैं। सबसे बड़ा कमरा मुख्यमंत्री नीतीश कुमार का है। नेता प्रतिपक्ष तेजस्‍वी यादव का कमरा पहली मंजिल पर है। सभाकक्ष में आजादी के बाद 1952 की पहली विधानसभा में 331 सदस्य बैठते थे, जो 1977 में 324 हो गए। इसके अतिरिक्त साल 2000 में बिहार के बंटवारे के साथ अलग राज्‍य झारखंड बना तो विधानसभा के सदस्‍य घटकर 243 रह गए।

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