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वसुंधरा राजे की धार्मिक यात्रा को लेकर मचा बवाल, भाजपा के आपसी मतभेद खुलकर आए सामने

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पूर्व मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे ने छह जिलों में अपनी चार दिवसीय “धार्मिक यात्रा” समाप्त करने के बाद भाजपा की राजस्थान इकाई धड़ों में बंटती नजर आ रही है और नेताओं के आपसी मतभेद खुलकर सामने आ रहे हैं। प्रदेश भाजपा नेतृत्व ने इसे राजे द्वारा भाजपा के समानांतर संगठन बनाने का प्रयास बताते हुए खुद को अलग कर लिया है। राजे ने पिछले सप्ताह एक “धार्मिक यात्रा” शुरू की थी, जिसमें उन्होंने राजस्थान के सभी मंदिरों में पूजा की और भाजपा नेताओं के परिजनों से मुलाकात की, जिन्होंने कोविड-19 महामारी के दौरान अपनी जान गंवाई थी। यह यात्रा उदयपुर, बांसवाड़ा, भीलवाड़ा, अजमेर, पाली और चित्तौड़गढ़ जिलों में की गई है। जिसके समाप्त होते ही अब राजस्थान भाजपा में नया संकट खड़ा हो गया है। कुछ राजनीतिक विशेषज्ञ इसे पार्टी के भीतर शक्ति प्रदर्शन भी बता रहे हैं।

राज्य भाजपा शीर्ष नेतृत्व को भेजेगी रिपोर्ट
एक मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक वसुंधरा राजे की इस यात्रा पर राज्य इकाई ने केंद्रीय नेतृत्व को एक रिपोर्ट भेजने का फैसला किया है, जिसमें जनसभाओं का आयोजन किया गया था। इस यात्रा में भाग लेने वाले भाजपा विधायकों, सांसदों और पूर्व विधायकों की सूची भी भेजी जाएगी। पार्टी के झंडे का इस्तेमाल विभिन्न बैठकों के दौरान प्रदर्शित पोस्टरों के प्रकार और नारेबाजी की भी जानकारी दी जाएगी। राज्य नेतृत्व को राजे की जिस बात ने परेशान किया, वह यह है कि यात्रा में कई विधायकों और सांसदों की भागीदारी और जबरदस्त सार्वजनिक प्रतिक्रिया देखी गई। इस यात्रा में भाजपा नेता प्रताप सिंह सिंघवी, राजपाल सिंह शेखावत और पूर्व विधायक यूनुस खान और अशोक परनामी सहित वरिष्ठ विधायकों ने सक्रिय रूप से भाग लिया और यात्रा की सभी तैयारियों का प्रबंधन किया। हालांकि राजे ने कहा है कि वह क्षेत्र के सभी मंदिरों में पूजा-अर्चना करने गई थीं और भाजपा नेताओं के शोक संतप्त परिवारों के प्रति उन्होंने अपनी संवेदनाएं व्यक्त की।

धार्मिक यात्रा निकालने की क्या है वजह !
एक अन्य मीडिया रिपोर्ट में राजनीतिक विशेषज्ञों के हवाले से कहा गया है कि राजे ने अपनी धार्मिक यात्रा पूरी तरह से सोच समझ कर की है। 2018 के विधानसभा चुनाव के समय से ही उन्हें उनकी पार्टी में ही घेरने की कोशिश की जा रही है। हार के बाद आलाकमान ने उनको साइड कर प्रदेश में नए नेतृत्व को उभारने की कोशिश की लेकिन उससे पार्टी को नुकसान ही हुआ। उनकी नाराजगी इस बात को लेकर भी रही है कि पार्टी की राष्ट्रीय उपाध्यक्ष होने के बाद भी केंद्रीय नेतृव ने उन पर हमला करने वाले पार्टी नेताओं को कभी नहीं चेताया। उनकी उपेक्षा का असर उप चुनाव, निकाय, निगम चुनाव पर सीधे पड़ा। पिछले महीने हुए दो उप चुनाव सीटों पर तो भाजपा तीसरे चौथे स्थान पर पहुंच गई। आलाकमान इस हार से खासा चिंतित हो गया है। विधानसभा चुनाव 2023 में होने हैं।

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भाजपा के लिए आसान नहीं है वसुंधरा की अनदेखी
राज्य की जनता और कार्यकर्ताओं पर अपनी पकड़ मजबूत करने के लिहाज से वसुंधरा राजे ने 23 नवम्बर से “देव दर्शन यात्रा” चित्तौड़गढ़ के सांवलिया मंदिर से शुरू की थी। इसके बाद बांसवाड़ा के त्रिपुरा सुंदरी मंदिर, नाथद्वारा स्थित श्रीनाथ मंदिर, उदयपुर के एकलिंग जी और चारभुजा मंदिर, अजमेर के धार्मिक स्थलों में भी दर्शन किए। इसके साथ राज्य के कई और इलाकों गई। इस यात्रा के साथ राजे ने कोरोना काल में मृतक नेताओं के घर जाकर संवेदना प्रकट की। जानकारों की माने तो राजे एक तरह से सीधा संदेश दे रही हैं वह प्रदेश में असल भाजपा हैं। बाकी नेताओं के मुकाबले राजे के पक्ष में यह बात भी जाती है कि वह राज्य में भाजपा के संस्थापक नेता विजयाराजे सिंधिया की पुत्री हैं। विजयाराजे की पार्टी को शिखर तक ले जाने में अहम भूमिका रही है। ऐसे में मौजूदा आलाकमान के लिये वसुंधरा की अनदेखी करना बहुत आसान नहीं है।

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