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इन 5 कारणों से राहुल गांधी के विजय रथ को रोकने में कामयाब रही स्मृति ईरानी

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नई दिल्ली: छोटे पर्दे की हर दिल अजीज बहू ‘तुलसी’ और ‘गांधी परिवार’ के गढ अमेठी में कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी के खिलाफ लोकसभा चुनाव में ऐतिहासिक जीत दर्ज करने वाली स्मृति ईरानी ने एक बड़ा उलटफेर करके राजनीति के गलियारों में अपना कद काफी ऊंचा कर लिया है। स्मृति को 468514, वहीं कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी को 413394 वोट मिले हैं।  पिछली बार चुनाव हारने के बावजूद स्मृति को नरेंद्र मोदी सरकार में मानव संसाधन विकास मंत्री बनाया गया था, बाद में वह सूचना प्रसारण और फिर कपड़ा मंत्री रही। आईए जानते हैं वो कारण जिनकी वजह से कांग्रेस के किले को ध्वस्त करने में कामयाब रही स्मृति ईरानी।

अपनी हार को स्मृति ईरानी ने बनाया ढाल
आम तौर में हम देखते हैं कि जिस सीट पर उम्मीदवारों की हार हो जाती है वहां पर उनकी सक्रियता कम हो जाती है, लेकिन स्मृति  इरानी ने अपनी 2014 की छोटी हार को एक ढाल की तरह इस्तेमाल किया। पांच सालों में उन्होंने 42 बार अमेठी के दौरे किए। स्थानीय कार्यकर्ताओं में यह भरोसा जगाया कि इस सीट से भी कांग्रेस को हराया जा सकता है।

जमीनी प्रचार से लेकर मीडिया तक छाई रही भाजपा
अमेठी में बीजेपी की जीत में पार्टी के मजबूत प्रचार तंत्र ने अहम भूमिका निभाई। पार्टी के अलावा आरएसएस के सभी संगठनों ने प्रचार के दौरान लोगों को विश्वास दिलाया कि राहुल गांधी नहीं अमेठी का भविष्य स्मृति ईरानी हैं। जमीनी प्रचार से लेकर मीडिया  तक जहां कांग्रेस कहीं दिखाई नहीं दी वहीं भाजपा ने आम लोगों में रही। कांग्रेस अध्यक्ष होने के नाते राहुल गांधी पूरे देश में प्रचार कर करने में जुटे रहे जिसकी वजह से अमेठी में अपना ध्यान पूरी तरीके से नहीं दे पाए।

पिछली पायदान पर ही खड़ा दिखाई दिया अमेठी
राहुल गांधी अमेठी सीट से 2004 से लगातार जीत हासिल करते आए हैं, लेकिन जब विकास की बात हुई तो अमेठी हमेशा पिछली पायदान पर ही खड़ा दिखाई दिया। स्थानीय लोगों में इस बात का हमेश मलाल रहा। स्थानीय लोगों में इस बात को लेकर एक आम राय हुई। बीजेपी ने इस दौरान अपना कनेक्ट यहां की जनता से बढ़ाने की कोशिश की जिसका नतीजा यह रहा कि राहुल गांधी की गढ़ कहे जाने वाली अमेठी सीट से स्मृति ईरानी को जीत हासिल हुई।

चुनावी क्षेत्र से कट गए थे राहुल
चुनावी क्षेत्र से कट जाना भी राहुल की हार का एक कारण कहा जा सकता है। दरअसल भले ही यहां की जनता का परिवार की वजह से राहुल कनेक्ट बना हुआ था, लेकिन खुद उनकी तरफ से ऐसे कोई प्रयास नहीं किए जिससे जनता का विश्वास जीता जा सके।

बदलाव का मूड में थी अमेठी की जनता
माना जा रहा है कि लंबे समय से गांधी परिवार के पास अमेठी की सीट रही है। 1999 से यह सीट पहले सोनिया गांधी फिर राहुल गांधी के पास रही है। इस वजह से जनता इस बार बदलाव का मूड बनाकर वोट करने गई थी। हालांकि ऐसा माना जाता है कि अमेठी के लोग गांधी परिवार से अपनी नजदीकी मानते हैं, लेकिन इसके बावजूद इस बार राहुल गांधी को हार का सामना करना पड़ा।

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