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सुप्रीम कोर्ट की गठित कमेटी के सदस्य अनिल घनवट बोले- यदि न्‍यायालय जारी नहीं करेगा तो हम सार्वजनिक करेंगे रिपोर्ट

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नई दिल्ली। कृषि कानूनों को रद करने की प्रधानमंत्री की घोषणा के बाद सुप्रीम कोर्ट द्वारा गठित कमेटी के सदस्य अनिल घनवट ने इसे दुर्भाग्यपूर्ण बताते हुए कहा कि इससे सुधार को बड़ा धक्का लगा है। उन्होंने सुप्रीम कोर्ट से आग्रह किया कि वह कमेटी की रिपोर्ट जारी करे अन्यथा वह खुद इसे सार्वजनिक करेंगे ताकि लोग उसे जाने और उस पर चर्चा हो। कमेटी के सदस्य और शेतकारी संगठन के अध्यक्ष अनिल घनवट ने शुक्रवार को ‘दैनिक जागरण’ से बातचीत में कहा कि कानून रद होने के बाद अब रिपोर्ट का उद्देश्य खत्म हो गया है

सार्वजनिक हो रिपोर्ट

ऐसे में वह चाहते हैं कि जो रिपोर्ट कमेटी ने सुप्रीम कोर्ट को सौंपी है, वह सार्वजनिक हो। कानून खारिज होने के बाद रिपोर्ट को गोपनीय रखने का कोई मतलब नहीं है। उन्हें पूरा विश्वास है कि जो रिपोर्ट कमेटी ने दी है, वह सबसे अच्छा फार्मूला है। कृषि के विकास के लिए उससे अच्छा फार्मूला नहीं हो सकता। वह यह नहीं कह रहे कि उस रिपोर्ट को पूरा लागू कर दिया जाए, लेकिन उस पर चर्चा होनी चाहिए और किसी के पास उससे अच्छे सुझाव हैं तो वे भी बताए जाएं। वह रिपोर्ट किसानों के हित में है।

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सोमवार को होगी बैठक 

घनवट कहते हैं कि सोमवार को कमेटी के सदस्यों की बैठक होगी जिसमें रिपोर्ट सार्वजनिक करने पर चर्चा होगी। अगर कमेटी में रिपोर्ट सार्वजनिक करने पर सहमति नहीं बनी तो वह अपनी ओर से रिपोर्ट सार्वजनिक कर देंगे। हालांकि ऐसा करने से पहले वह विशेषज्ञों के साथ कानूनी पहलुओं पर परामर्श करेंगे और देखेंगे कि कहीं ऐसा करने से सुप्रीम कोर्ट की अवमानना तो नहीं होती।

सभी पहलुओं पर है रिपोर्ट 

वैसे तो उन्होंने रिपोर्ट सार्वजनिक हुए बगैर उसके बारे में कुछ भी बताने से इन्कार कर दिया, लेकिन जानकार सूत्रों के मुताबिक कमेटी ने रिपोर्ट में लगभग सभी पहलुओं पर अपनी राय प्रकट की है। माना जा रहा है कि कमेटी ने कृषि कानूनों में दिए गए विवाद निवारण प्रणाली में राजस्व अदालत को अधिकार देने के बजाय इसके लिए कृषक अदालत या ट्रिब्युनल आदि गठित करने की बात की है। मार्केट सेस किसे लेना है, इस पर भी राय है।

किसानों की बेहतरी पर राजनीति

एमएसपी के मुद्दे पर माना जा रहा है कि कमेटी ने मसला केंद्र के बजाय राज्यों पर छोड़ने की बात कही है क्योंकि कमेटी का मानना है कि प्रत्येक राज्य की परिस्थितियां और उपज अलग-अलग होती हैं। प्रेट्र से बातचीत में घनवट ने प्रधानमंत्री मोदी के कदम को सबसे प्रतिगामी बताया जिसमें किसानों की बेहतरी पर राजनीति को चुना गया है।

सुझाए गए थे कई समाधान

उन्होंने कहा कि कमेटी ने तीनों कृषि कानूनों में कई सुधार और समाधान सुझाए थे लेकिन गतिरोध दूर करने के लिए उनका इस्तेमाल करने के बजाय मोदी और भाजपा ने कदम वापस खींचने का विकल्प चुना। वे सिर्फ चुनाव जीतना चाहते हैं और कुछ नहीं। घनवट ने कहा कि अब कृषि क्षेत्र और उसके विपणन के क्षेत्र में सभी तरह के सुधारों के दरवाजे बंद हो गए हैं। पार्टी (भाजपा) के राजनीतिक हितों पर किसानों के हितों को कुर्बान कर दिया गया है।

19 मार्च को दाखिल की थी रिपोर्ट

बता दें कि तीनों नए कृषि कानूनों की वैधता को विभिन्न याचिकाओं के जरिये सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी गई है। सुप्रीम कोर्ट में मामला लंबित है। कोर्ट ने 12 जनवरी को कृषि कानूनों के अमल पर अंतरिम रोक लगाते हुए विशेषज्ञों की कमेटी गठित की थी। कोर्ट ने कमेटी से सभी संबंधित पक्षकारों और केंद्र सरकार से बात करके कोर्ट में रिपोर्ट देने को कहा था। कमेटी ने 19 मार्च को सुप्रीम कोर्ट में अपनी रिपोर्ट दाखिल कर दी थी।

कमेटी की रिपोर्ट नहीं की गई सार्वजनिक

रिपोर्ट दाखिल हुए करीब सात महीने बीतने वाले हैं लेकिन उसके बाद न तो यह मामला सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई पर आया और न ही कोर्ट ने कमेटी की रिपोर्ट सार्वजनिक की।

महत्वहीन हो जाएंगी सुप्रीम कोर्ट में दायर याचिकाएं

कृषि कानूनों को रद करने की घोषणा के बाद सुप्रीम कोर्ट में लंबित याचिकाओं का कोई मतलब नहीं रह जाएगा। कानून रद होने के बाद उसे चुनौती देने वाली सभी याचिकाएं महत्वहीन हो जाएंगी। हालांकि ऐसा नहीं है कि सुप्रीम कोर्ट में याचिका दाखिल करने वाले सभी याचिकाकर्ता कानूनों को रद करने की मांग कर रहे थे, कुछ याचिकाओं में कानूनों की तरफदारी करते हुए उन्हें लागू करने की मांग भी की गई थी जिनमें नोटिस भी जारी हो चुका है।

महत्‍वहीन हो जाएंगी याचिकाएं

कानून लागू करने की मांग उत्तर प्रदेश की कुछ मैदा मिलों और चावल मिलों की ओर से भी याचिका दाखिल करके की गई थी। प्रेट्र के मुताबिक, वरिष्ठ अधिवक्ता और संविधान विशेषज्ञ राकेश द्विवेदी का कहना है कि याचिकाएं महत्वहीन हो जाएंगी, लेकिन संसद से पारित कानून को अध्यादेश के जरिये या संसद में कानून पारित करके ही वापस लेना होगा, इन्हें सिर्फ मौखिक बयान से वापस नहीं लिया जा सकता।

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